गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

रेलवे भर्ती बोर्ड की भर्ती प्रक्रिया, मेरिट सूची, एवं पद वरीयता क्रम आदि क्या है?

रेलवे भर्ती बोर्ड की भर्ती प्रक्रिया, मेरिट सूची, एवं पद वरीयता क्रम


भारतीय रेलवे की सबसे केंद्रीयकृत व्यवस्था में सबसे ऊँचे पायदान पर एक रेलवे बोर्ड होता है।

> जिसमे एक रेलमंत्री, 2 रेलराज्य मंत्री, और 6 मेम्बर होते हैं, जो रेलवे के 6 विभिन्न विभागों के प्रमुख होते है।

> इनके नीचे भारतीय रेलवे को प्रसाशनिक प्रबंध की दृष्टि से 17 भागों में बाँटा गया हैं जिसे "रेलवे जोन" कहते हैं जिनका प्रमुख GM (जनरल मैनेजर) कहा जाता है।

> हर जोन में कम से कम 3 और अधिक से अधिक 8 डिविजन होते हैं. हर डिविजन का प्रमुख DRM कहलाता है।

> हर जोन के विभिन्न डिविजन को ग्रुप-सी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है‌ जिनकी आपूर्ति के लिये RRB की स्थापना की गयी है।

भारत में इस समय 21 RRB कार्यरत हैं। इसके अलावा SSC के माध्यम से भी स्टाफ आते हैं।

(नोट:- ग्रूप -D स्टाफ की अपूर्ति RRC के माध्यम से होती है)

> हर RRB के क्षेत्राधिकार में कुछ‌ Railway Divisions आते हैं। किसी भी RRB के साईट पर आप देख सकते हैं की वो किन किन रेलवे डिविजन के लिये योग्य अभ्यर्थियों को चुन कर भेजेगा।

चयन की प्रक्रिया :-

सबसे पहले रेलवे का हर डिविजन स्टाफ की सूची बनाता है, कि उनको किन किन प्रकार के पदों के लिये कितने स्टाफ की आवश्यकता है। और उसे रेलवे बोर्ड की स्वीकृति के लिये दिल्ली भेज दिया जाता है।

> स्वीकृति मिलने के बाद RRB को चयन प्रक्रिया आरंभ करने के लिये अनुदेश दे दिये जाते हैं। साथ ही हर प्रकार के पद के सन्दर्भ में गाइडलाईन भी बता दी जाती है। शैक्षणिक योग्यता, ग्रेड पे, सलेबस, सायको आदि क्या और किस स्तर का होना चाहिये।

> अब RRB विज्ञापन जारी कर योग्य अभ्यर्थियों से आवेदन माँगता है। आवेदन मिलने के बाद स्क्रूटनी की जाती है और योग्य छात्रों को परीक्षा में शामिल होने के लिये बुलावा पत्र जारी किये जाते हैं।

(इस बीच RRB परीक्षा आयोजित करने की सारी व्यवस्था कर लेती है)

> दो चरणों की लिखित परीक्षा (ऑन लाईन) आयोजित की जाती है।

> परीक्षा में 4 वैकल्पिक उत्तर वाले प्रश्न पूछे जाते हैं। समय सीमा, निगेटिव मार्किंग इत्यादि के लिये स्पष्ट नियम निर्धारित किये जाते हैं।

> परीक्षा में प्राप्त अंको के नार्मलाईजेशन के बाद 8 गुने लोगों को टायपिंग और सायको टेस्ट के लिये बुलाया जाता है।

> जबकि इस समय तक नॉनटायपिंग और नॉनसायको वाले पदों के रिजल्ट जारी नहीं किये जाते हैं।

> सारी परीक्षा और टेस्ट हो जाने के बाद हर पदों के विरूद्ध एक गुना रिजल्ट प्रत्येक कटेगरी में जारी किया जाता है। साथ ही 30% अतिरिक्त वेटिंग लिस्ट वाला रिजल्ट भी जारी किया जाता है।

> एक गुना रिजल्ट और 30% एक्स्ट्रा रिजल्ट में जितने भी अभ्यर्थी आते हैं, सभी को सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के लिये बुलाया जाता है।

> सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के दौरान ही निम्नलिखित चीजें भी मिलान की जाती हैं –

- हस्ताक्षर/सिग्नेचर का मिलान 

- अँगूठे की छाप का निशान का मिलान 

- शरीर के 2 पहचान चिन्ह का मिलान 

- फोटो का मिलान

> दोषी/जालसाजी करने वाले लोगों के विरूद्ध कार्यवाही भी की जाती है।

> अब आपको वापस भेज दिया जाता है।

> पुरी तरह आश्वस्त होने के बाद चयनित अभ्यर्थियों की सूची डॉजियर के साथ संबंधित रेलवे डिविजन को भेज दी जाती है।

[डॉजियर :- जब आप मेन इग्जाम पास कर जाते हैं, तो RRB हर अभ्यार्थी के लिये अलग–अलग फाईल में उससे संबंधित सारे रिकार्ड रख देती है। फाईल के ऊपर आपका नाम /रोलनंबर/पोस्ट etc लिखा जाता है]

आपके डाजियर में ये चीजें रहेंगी–

- आपका आवेदन पत्र 

- आपके एडमिट कार्ड की कटिंग (जो आपने परीक्षा रूम में दी थी)

- आपका OMR रिस्पान्स सीट 

- आपका फोटो

- आपका सिग्नेचर 

- आपका अँगूठे का निशान 

- सारे सर्टिफिकेट के फोटो कॉपी इत्यादि।

> अब कुछ दिनो के बाद RRB रोलनंबर, नाम, कैटेगरी के साथ चयनित अभ्यार्थी की फाईनल सूची जारी कर देता है। इस समय कोई एक्स्ट्रा 30% का नाम नही दिया जाता है।

{एक्स्ट्रा 30% अभ्यर्थी :- सफल अभ्यार्थियों के ना आने/मेडिकल अनफिट होने इत्यादि स्थिति में इन एक्स्ट्रा लोगों को ज्वाईनिंग लेटर भेजा जाता है। ये लेटर अगले एक साल के बीच कभी भी आ सकता है, और नही भी आ सकता है। इसकी कोई सूचना RRB के वेबसाईट पर नहीं दी जाती है}

>> फाइनली सिलेक्टेड लोगों को रेलवे डिविजन द्वारा ज्वाइनिंग लेटर भेजा जाता है।

- फिर मेडिकल टेस्ट होता है।

- फ़िर ट्रेनिंग 

- और फ़िर ड्यूटी सौंप दी जाती है।

मेरिट सूची, एवं पद वरीयता का महत्व :-

> आप किस पद पर चुने जायेंगे इसके जिम्मेदार केवल आप ही हैं।

> RRB केवल आपके वरीयता के क्रम और आपके मेरिट सूची के आधार पर ही आपको चुनती है।

> इसकी प्रक्रिया को समझने के मान लेते हैं

 की किसी RRB में 6 प्रकार के पद हैं.

CA, TA, GG, ECRC = इन चारों पदों के लिये केवल 2 चरण की परीक्षा है।

SM = इसके लिये सायको टेस्ट भी है।

JAA = इसके लिये टायपिंग टेस्ट भी है।

माना की हर प्रकार के पद 10 -10 की संख्या में है। कुल 60 पद हैं।

कुल 100 लोगों ने अप्लाई किया है।

(ऐसा आप मान लें, ताकि आप प्रक्रिया को समझ सकें , बाद में इसी आधार पर अपने RRB में अपनी स्थिति को आसानी से समझ सकते हैं )

अब सारे लोग अपनी अपनी पसंद के अनुसार क्रम निर्धारित करेंगे.

जैसे :-  

1) CA TA GG ECRC SM JAA

2) SM CA TA ECRC GG JAA

3) JAA CA TA ECRC GG SM

4) SM JAA CA TA ECRC JAA 

6) JAA SM CA TA ECRC GG

कुल 6 प्रकार के पदों को कुल 720 अलग अलग तरीकों से सजाया जा सकता हैं. अत: इतने अलग अलग तरह की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।

- कोई टायपिंग वाले पद को आगे रखेगा 

- कोई सायको वाले पद को आगे रखेगा 

- कोई अन्य पदों को आगे रखेगा 

अब माना की विभिन्न पदों का प्रारम्भिक कट आफ अगर ऐसा हुआ :-

CA :- 95%

TA :- 90%

ECRC :- 85%

GG :- 80%

SM :- 70%

JAA :- 60%

अब अगर किसी के 82% अंक आए और 

1) अगर उसका क्रम ऐसा है – CA TA GG ECRC SM JAA तो इनको CA TA ECRC नही मिलेगा। उसके ये योग्य नहीं। इनको गार्ड मिलेगा सायको/टायपिंग के लिये नहीं बुलाया जायेगा।

2) अगर उसका पसंद का क्रम ऐसा है – SM CA TA ECRC GG JAA तो उसका कट आफ गार्ड से अधिक है लेकिन उसको सायको के लिये बुलाया जायेगा क्योंकि उसने पहली वरीयता SM बनने की चुनी है। वो सायको फ़ेल हो गया तो गार्ड बनेगा।

(नोट :- इसिलिये सायको/टायपिंग के बाद ही GG TA CA ECTC का रिजल्ट देते हैं ताकि हाई मेरिट वाले लोग अगर सायको/टायपिंग में सफल ना हों तो उन्हें ये पद दिये जा सकें)

 3) अगर उसकी पसंद का क्रम ऐसा है – JAA CA TA ECRC GG SM तो उसे केवल टायपिंग के लिये बुलाया जायेगा। टाइपिंग क्वालीफाई करने पर वो JAA बनेगा। क्वालीफाई नहीं कर सका यो GG बन जायेगा क्योंकि उसने GG के कट आफ से अधिक मार्क्स/अंक प्राप्त किए हैं।


4) अगर उसकी पसंद का क्रम ऐसा है – SM JAA CA TA ECTC GG तो उसे सायको और टाइपिंग दोनों के लिये बुलाया जायेगा। दोनों पास करने पर अपनी पसंद के क्रम के आधार पर SM बनेगा। केवल एक पास करने पर कोई एक (SM/JAA - जो वो पास करेगा) बनेगा। दोनों में फ़ेल/अबसेन्ट करने पर वो GG बनेगा। 

5) अगर कोई व्यक्ति जो अपने काबिलियत के आधार पर 99% अंक लाता हैं और उसका पसंद का क्रम ऐसा है – SM JAA GG ECRC TA CA तो उसे सायको/टाइपिंग के लिये बुलाया जायेगा। क्योंकि SM, JAA उसकी प्राथमिकता क्रम में आगे हैं। यहां पर दो परिस्थितियां बनेंगी –

स्थिति -1) :- 

अगर वो सायको/टाइपिंग में ना जाये या जाकर भी क्वालीफाई ना करे तो उसको उसके तीसरे पसंद के आधार पर GG बनाया जायेगा। क्योंकि गलत वरीयता चुनने के कारण मेरिट सूची में आगे रहने के बावजूद उसे अधिक अच्छा पद नहीं मिलेगा। और यही है वरीयता सूची का महत्व।

स्थिति -2) :-

अगर वो सायको पास कर गया और SM बन गया लेकिन SM का मेडिकल स्टैंडर्ड A-2 पास ना कर पाया तो वो जॉब से बाहर हो जायेगा। जबकि, अगर वो CA पहले चुनके CA बन जाता और CA का मेडिकल स्टैंडर्ड C-1 पास करने में सक्षम रहता तो उसके लिये CA आगे चुनना अच्छा रहता।

सायको /टायपिंग के लिये बुलाये जाते समय TA CA ECRC GG का रिजल्ट नहीं आयेगा। ना कट-ऑफ आयेगा क्योंकि जो मेरिट में आगे हैं और SM JAA में छंट कर वापस GG TA CA ECRC बनेंगे वो इन चार पदों का कट आफ भी बदल देंगे।

 

कौन है स्टेशन मास्टर ?

कौन है स्टेशन मास्टर ?
    भारतीय रेलवे का सबसे महत्वपूर्ण कर्मचारी जो बहुप्रशिक्षित,अत्यन्त समझदार, तीव्र बुद्धि वाला व्यक्ति होता है। सामान्यत: बहुआयामी कार्यों को अंजाम देने वाला और विपरीत परिस्थितियों में बिल्कुल सटीक निर्णय लेनेवाला महामानव है।
चयन कैसे होता है?
इसका चयन RRB के माध्यम से होता है।
डिविजन की आवश्यकता >
RRB को अनुदेश >
रिक्तियाँ प्रकाशित करना >
अभ्यर्थियों द्वारा आवेदन >
परीक्षा(दो चरणों में) >
मनोवैग्यानिक परीक्षण >
प्रमाण पत्रों की जांच >
अन्तरिम चयन >
डिविजन को सौपना >
चिकित्सकिय जांच >
बाँड भरना >
ट्रेनिंग >
स्टेशन पे पदस्थापना।
[ बाँड :- आपको कोर्ट से एक बाँड पेपर बनवाकर देना होगा कि "आप 5 साल तक लगातार कार्य करेंगे और नौकरी छोड़ कर नही भागेंगे]
> ये बहुत आसान कार्य है।
> कोर्ट में नोटरी से बनवाना होगा।
> 200/- तक व्यय होगा।
> वकील सारा कार्य करवा देगा।
> 2 गवाहों की आवश्यकता होगी।
> ओरिजनल प्रति रेलवे को सौपनी होगी।
ट्रेनिंग कैसे होती है?
> आप रेलवे के किसी भी पद पर कार्य करें. उससे पहले समुचित ट्रेनिंग होती है।
> ट्रेनिंग रेलवे के जोनल रेलवे ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में दी जाती है।
> ट्रेनिंग के बाद परीक्षा ली जाती है।
> पास होने के बाद आपके पद से संबंधित सक्षमता प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है।
> अनुतीर्ण होने पर फ़िर से परीक्षा देना होगा। दोबारा से अनुत्तीर्ण होने पर नौकरी से बाहर जाईये।
> वर्तमान में देश के विभिन्न जोनों में SM की ट्रेनिंग 100 -120 दिन तक होती है।
> ट्रेनिंग के तहत SM के आपरेटिंग के कार्य के थ्योरी क्लासेस, प्रैक्टिकल क्लासेस और स्टेशन पे भेजकर भी ट्रेनिंग दी जाती है।
> ट्रेनिंग के दौरान आपको बेसिक पे दिया जाता है।

वेतन और अन्य सुविधायें :-
> अभी SM का बेसिक पे 4200 GP (6ठा वेतनमान के अनुसार) या 35,400 (7वां वेतनमान के अनुसार) हैं।
> इसमे महँगाई भत्ता, रात्रिकालीन ड्यूटी भत्ता, आवास भत्ता इत्यादि जोड़कर दिया जाता है।
> वर्तमान में आपको पहला वेतन 38,000/- के आस पास मिलेगा।
> आप चाहे तो रहने के लिये आवास/क्वार्टर मिलेगा।(क्वार्टर लेने पर आवास भत्ता नही मिलेगा)
> आपको आपके पत्नी, बच्चों, विधवा माँ, दिव्याँग/आश्रित/अविवाहित भाई-बहन के लिये सलाना एक पास(अप एंड डाऊन दोनों) और 4 पी.टी.ओ मिलेंगे।
(पास में 100% मुफ़्त यात्रा, पी.टी.ओ में यात्रा का 30% भाड़ा आप देंगे -70% रेलवे देगी।) 
> 5 साल की लगातार नौकरी के बाद प्रतिवर्ष 3 पास मिलेंगे।

सम्मान :–
स्टेशन मास्टर का समाज में आज भी बहुत सम्मान हैं. अगर आपका स्टेशन किसी गाँव में हैं तो आपका सम्मान किसी बैंक के शाखा पदाधिकारी/स्कूल के हेड मास्टर / VRO / सरपंच के समकक्ष ही होता है।

प्राथमिक कार्य :-
SM का मुख्य कार्य रेलगाड़ी को पिछले स्टेशन से लेकर अगले स्टेशन तक सकुशल पहुँचाना है। इसके अतिरिक्त छोटे स्टेशनो पर टिकट विक्रय करना भी है।
(अन्य कार्यों को विस्तार पूर्वक आगे समझेंगे, जब उनकी कठिनाईयों के बारे में पढ़ेंगे)

समस्याएं और कठिनाइयां :–
        मानता हूं कि भारत के अधिकांश सरकारी या प्राईवेट नौकरी में वर्क लोड, छुट्टी, सीनियर का दबाव इत्यादि बहुत सी समस्यायें हैं। बहुत से लोग दिन रात मेहनत कर रहें हैं। कुछ आराम भी फरमा रहे हैं। बैंक पीओ, पुलिस, लोको पायलेट, गार्ड इत्यादि की समस्याओं के बारे में सारा समाज जानता है। लेकिन स्टेशन मास्टर एक ऐसी उपेक्षित कैटगरी है जो दिन-रात मेहनत करते हैं लेकिन लोग उसे आराम करने वाले अधिकारी के तौर पे ही जानते हैं।

कार्य :–
> ब्लॉक इन्स्ट्रूमेंट, पैनल इत्यादि की सहायता से ट्रेनों के यातायात का प्रत्यक्ष प्रचालन करना।
> सारे सिग्नलों को आपरेट करना।
 (और बाहरी दुनिया के लोग समझते हैं की ये काम सिग्नल मेन्टेनर का है। जबकि उसका कार्य केवल नियमित समय पर सिग्नलो और संबंधित यन्त्रों का अनुरक्षण/मेन्टेनेंस करना एवं अचानक कुछ खराबी आने पर ठीक करना भर हैं)
कुछ मिलाकर अगर स्टेशन मास्टर कार्य करने वाला साफ्टवेयर इंजीनियर हैं तो सिग्नल मेन्टेनर खराबी ठीक करने वाला हार्डवेयर इंजीनियर की भाँति हैं।
> बहुत सी डायरी और रजिस्टरों में इंट्री करना -ना केवल ट्रेन के यातयात बल्कि अन्य बातों के लिये भी 78 अलग अलग रजिस्टर होते हैं. एक भी इंट्री छूटने या गलत लिखे जाने पर चार्जशीट और पनिसमेंट का भय रहता है।
> रात में सारे सिग्नल स्टाफ़, गैंग स्टाफ, की मैन, आरपीएफ इत्यादि ड्यूटी पर भी‌ सोते मिलेंगे, काम करते हैं तो केवल स्टेशन मास्टर, कंट्रोलर, प्वाइंट्स मेन, गार्ड, और लोको पायलट।
रात के समय में जब आप AC कोच में सोते हुए यात्रा करते हैं और सुबह ट्रेन से उतरकर कहते हैं की की मैं लंबी यात्रा से थक गया और एक दिन आराम करूँगा, तभी आप अवश्य सोचिये आपके जैसा एक इंसान रात भर बिना एक मिनट बैठे लगातार 10 घंटे तक पूरे ऑफिस में और ऑफिस के बाहर बार बार दौड़ दौड़ कर काम करता रहता है।
अगर कोई इंसान एक रात किसी विवाह की बारात में जागता है तो अगले 2 दिनो तक दिन भर सोता ही रहता है।
और वहीं SM लगातार 7 दिनों तक नाइट ड्यूटी करते हैं।
 
SM का वास्त्विक कार्य तो दिल दहला देने वाला है :-
> मान लिजिये A B C D तीन लगातार स्टेशन हैं, और आप स्टेशन C के स्टेशन मास्टर हैं। तो,
> जैसे ही स्टेशन A से ट्रेन खुलेगी. स्टेशन B वाला SM एक मशीन का बटन दबायेगा. जिससे आपके स्टेशन पर एक घंटी बजेगी.
> आप तुरंत दौड़कर उस मशीन के पास जायेंगे और एक बटन दबायेंगे. जिससे उसके पास एक घंटी बजेगी।
> स्टेशन -B :- मेरे पास एक ट्रेन है, 12310 डाउन पटना राजधानी एक्सप्रेस, भेजना चाहता हूँ, अनुमति (लाईन क्लियर) दिजिये।
 आप (स्टेशन -C) :- आप 2 मिनट इन्तजार करें।
> आप 2 मिनट में स्टेशन B. और स्टेशन C के बीच के सारे रेलवे फाटक/गेट को बंद करवाते हैं और अन्य अनिवार्य बातों पर भी गौर करते हैं।
> अब आप पिछले स्टेशन-B को एक भारी मशीन की घुन्डी घुमाकर लाईन क्लीयर देंगे।
> आप लाइन क्लीयर देंगे उसके बाद ही वो सिग्नल को हरा (green light ) कर पायेगा. जिसे देखकर लोको पायलट ट्रेन उस स्टेशन -B को पार कर पायेगा।
> 5 - 7 मिनट के बाद ट्रेन उसके स्टेशन से बढकर जैसे ही आगे निकलेगी, आपके स्टेशन में एक मशीन से जोर से आवाज आने लगेगी।
> अब आप सेक्शन कंट्रौल को फ़ोन करेंगे कि क्या करना है?
वो बताएंगे कि ट्रेन को थ्रू करना है या, किसी अन्य ट्रेन के इंतजार में उसे लूप लाइन में रीसिव करके अगले आदेश तक रखना है।
(प्राय : गुड्स ट्रेन या, पैसेंजर ट्रेन को लूप में घुसा दिया जाता है और सुपरफास्ट ट्रेन को मैन लाईन से थ्रू किया जाता है।)
>थ्रू ट्रेन को SM दिन में अपने रूम से निकलकर झंडा (हरा/लाल) और रात में सिग्नल दिखाता है। ऐसा सिग्नल एक्सचेंज नही करने पर अगर कोई(LP या, GG) शिकायत कर दे तो दंड निर्धारित हैं।
[ जिन लोगों की आँखे दोषपूर्ण हैं या, कलर ब्लाइंड हैं वो लाल और हरा में भेद नही कर पाएंगे।
ऐसे में वो कैसे लाल या हरा सिग्नल / झंडा पहचानेंगे।
क्या वो ट्रेन में बैठे हजारो यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ नहीं करेंगे?
अगर वो आगे ट्रेन होने पर भी लाल रंग को हरा समझ लाल (वास्तव में हरा) सिग्नल दे दें तो ट्रेन रूकने के बजाय दौड़ेगी और क्या होगा?
हालांकि हमारा सिग्नलिंग सिस्टम ऐसी गलती को नहीं होने देगा।
मेरी नेत्र दोष वाले भाईयों से हाथ जोड़ कर विनती है कि आप चालाकी करके SM चुने जाने के लिए अन्यायपूर्ण /अनैतिक प्रयास ना करें। सच्चाई को स्वीकारें और देशहित वाले कार्य ही करें।
> यही प्रक्रिया
 चलती रहती है और ट्रेन कश्मीर से कन्याकुमारी तक पहुँच जाती है।
> पर्व में छुटटी नहीं मिलती, मिलता है तो स्पेशल ट्रेन के रूप में अतिरिक्त वर्क लोड।
> छुट्टी की इतनी किल्लत हैं की पास -पीटीओ धरे ही रह जाते हैं। और अगर टिकट लिया तो अधिकतर कैंल ही कराना पड़ सकता है।
> हर ट्रेन को झंडा दिखाना (अगर ना दिखाया और ट्रेन में बैठे किसी अधिकारी ने देख लिया, या किसी कर्मचारी(LP या GG) ने शिकायत कर दी तो सजा मिलनी तय हैं।
ये सजा कम से कम साल भर या उससे भी अधिक दिन तक इंक्रीमेन्ट कट के रूप में मिलती हैं अर्थात कम से कम 24 हजार की हानि।
-भारत के 7800 रेलवे स्टेशन में से आज भी 5000 से ज्यादा स्टेशन में "स्टेशन मास्टर" को ही टिकट जारी करने का अतिरिक्त कार्य दिया गया है। जबकि टिकट लेने वालो की भीड़ बहुत बढ चुकी है। लोगों को टिकट देने में बक-झक होना आम बात है। इसी बीच अगर ट्रेन ऑपरेटिंग में देर हो जाये या किसी कमर्शियल कार्य में कुछ गलती हो जाये तो स्टेशन मास्टर को ही सज़ा मिलती है। आप विश्वास नही करेंगे ना केवल सिस्टम ओपेन कर टिकट बेचना होता है बल्कि उनका पक्का रिकार्ड भी रजिस्टर में तैयार करना होता हैं और अकॉउंट ऑफिस को भी भेजना होता है।
> बहुत बार तो बिजली/एलेक्ट्रिक की गड़बडी भी खुद ही ठीक करना होता हैं।
> रेलवे दुनिया की एक मात्र ऐसी नौकरी हैं जिसमे कई बार दूसरे की गलती की सजा आपको दी जाती है। और ऐसी सजा अक्सर SM को मिलती ही रहती है। अपनी गलती ना होने पर भी क्षमा याचना करनी पड़ती है।
> आम जिन्दगी में लोग लोग बहुत बार चाभी भूल जाते हैं, रुमाल भूल जाते हैं, कभी कलम तो कभी मोबाईल भूल जाते हैं। कुछ लोग चश्मा ढूँढते नज़र आते हैं।
बहुत बार SM अपने समय पे इंक्रिमेन्ट ना मिलने या कोई भत्ता ना मिलने के कारण ऑफिस जा जा कर अपनी चप्पलें घिसते हैं (वो भी नाइट ड्यूटी के बाद) और पता चलता है कि ये एक क्लर्क मिस्टेक है। जिसकी सजा क्लर्क को नहीं हमे मिलती है। अपने हक को पाने के लिये भी घूस देनी पड़ती है।
> लेकिन अधिक वर्क लोड के कारण, ऑफिस में लोगों की भीड़–भाड़ के कारण, कन्फयूजन के कारण या और भी किसी कारण से जीवन में केवल एक बार अगर कोई स्टेशन मास्टर कोई ग़लती कर जाये तो सज़ा मिलनी तय है। और अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो नौकरी से हाथ धोने के अलावा बांकी जिन्दगी जेल में बितानी पड़ सकती है। सीधा धारा -302 (जानबूझकर की गयी हत्या) का मामला दर्ज होता हैं।
> हमारे पास रेलवे के 16 विभाग से जुडे अधिकार नाम मात्र होते हैं और जिम्मेदारी (कर्तव्य) असिमित होती है। किसी विभाग की गलती का खामियाजा उसके साथ साथ ऑनड्यूटी SM को भी मिलता है। जैसे सब्जी कुछ भी पके, नमक तो बर्बाद होगा ही। इस लिये हर स्टेशन मास्टर को हरफनमौला बनना पड़ता है।
> छुट्टी तो भूल ही जाइए, रेस्ट कब मिलेगा यही निश्चित नहीं होता। स्टाफ के अभाव में ओवरटाइम ड्यूटी करना और बिना रेस्ट के कई हफ्तों ड्यूटी करना आम बात है।
  स्टेशन मास्टर की ड्यूटी बच्चों का खेल नही है। एक आग का दरिया है। जिसे तैर के पार करना है।

" वास्तव में स्टेशन मास्टर भारतीय रेलवे का वो सच्चा सिपाही हैं जो फ्रंट पे जाके लड़ता है। और हर वार को सीने पे झेलता है।
  अगर आप ट्रेन में आराम से सो रहें हैं, ताश खेल रहे हैं, लैपटाप पे फ़िल्म देख रहे हैं, नौकरी ज्वाईन करने जा रहे हैं , पर्व में परिवार से मिलने जा रहे हैं , तो हमेशा याद रखें की जाने कितने SM, गार्ड, लोको पायलट, गेटमैन इत्यादि कितनी तकलीफ़ और कठिनाई में ड्यूटी कर रहें हैं।

 
"भारतीय रेलवे न डीजल से चलती हैं, ना इलेक्ट्रिक से चलती हैं , ये तो ओपन लाइन स्टाफ के खून और पसीने से चलती है।"

बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

जानें कौन हैं उत्तर मध्य रेलवे की पहली महिला स्टेशन मास्टर।

जानें कौन हैं उत्तर मध्य रेलवे की पहली महिला स्टेशन मास्टर–


एक युवा महिला होने के कारण, उन्हें बताया गया कि यह नौकरी एक महिला के लिए नहीं है। दो दशक बाद, उन्हें आगरा मंडल के सर्वश्रेष्ठ स्टेशन मास्टरों में से एक के रूप में सम्मानित किया गया, जिसमें पुरुष-प्रधान विभाग में काम करते समय लापरवाही या गलती का कोई रिकॉर्ड नहीं था। वह एनसीआर (तब मध्य रेलवे) की पहली महिला स्टेशन मास्टर थीं।

 मथुरा जंक्शन की स्टेशन मास्टर त्रिवेश कुमारी शर्मा से मिलिए, जो भारत की सबसे तेज़ ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस, नई दिल्ली-भोपाल शताब्दी, कई राजधानी और मथुरा से गुजरने वाली अन्य एक्सप्रेस ट्रेनों सहित हर दिन 300 से अधिक ट्रेनों का संचालन करती हैं।

 “मैं मार्च 1992 में रेलवे में शामिल हुई, और प्रशिक्षण के लिए भुसावल भेजी गई। तब मेरे प्रशिक्षकों ने मुझे बताया कि पुरुष उम्मीदवारों के बैच में मैं पहली महिला कर्मचारी हूं, जिन्हें सहायक स्टेशन मास्टर की नौकरी के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। मेरे प्रशिक्षण के पहले दिन, महिला कर्मचारी के रूप में मेरी क्षमता और दक्षता पर सवाल उठाया गया था, और लोगों ने मुझे बताया कि यह नौकरी महिलाओं के लिए नहीं है। मैंने अपने प्रशिक्षकों से मुझे अच्छी तरह से पढ़ाने के लिए कहा, ताकि मैं उन रूढ़ीवादी धारणाओं को तोड़ सकूं,” शर्मा ने कहा, जो अपने दो महीने के बेटे भावेश के साथ उनके प्रशिक्षण में शामिल हुई थी, जो अब एमटेक कर रहा है।

“एक महीने बाद, मैं मुंबई के माटुंगा रेलवे स्टेशन(जो पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित है।) की वर्तमान स्टेशन मास्टर ममता कुलकर्णी से मिली, हम दोनों ने एक-दूसरे का समर्थन किया और प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूरा किया और अपने-अपने डिवीजनों में शामिल हो गए,” शर्मा ने कहा।

समाजशास्त्र और हिंदी में डबल एमए, शर्मा ने कहा, “उन दिनों, जब लड़कियों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी, मेरे पति और ससुराल वालों ने रेलवे में शामिल होने के मेरे फैसले का समर्थन किया। मुझे हमेशा ट्रेनों से लगाव था।" उनके पति यादराम शर्मा, मथुरा जंक्शन से लगभग 10 किमी दूर, बाद स्टेशन पर कैरिज और वैगन विभाग के एक वरिष्ठ सेक्शन इंजीनियर हैं, जबकि उनके ससुर खारचेर मल शर्मा, रेलवे के एक सेवानिवृत्त गेटमैन हैं।

 मथुरा जंक्शन पर 25 वर्षों के अनुभव के साथ, शर्मा अपने काम में इतनी निपुण हैं कि उन्होंने आज तक ट्रेन संचालन में एक भी गलती नहीं की है।

 यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। यहां तक ​​​​कि .01% त्रुटि के परिणामस्वरूप कुछ विनाशकारी हो सकता है। मथुरा जंक्शन में एक साल में एक करोड़ से अधिक लोगों की आवाजाही होती है, जबकि सैकड़ों ट्रेनों में लाखों लोग गुजरते हैं।

 शर्मा आगरा मंडल की उन 5% महिला कर्मचारियों में से हैं, जिन्होंने अपनी समर्पित पेशेवर कार्यशैली से प्रशंसा और सम्मान अर्जित किया है।

 उनके सीनियर्स उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं।

 आगरा मंडल के मंडल वाणिज्य प्रबंधक संचित त्यागी ने कहा, “त्रिवेश कुमारी शर्मा ने महिला वर्ग में रेलवे से पुरस्कार जीता है। हमारे रिकॉर्ड बताते हैं कि उसकी प्रोफाइल में एक भी शिकायत या त्रुटि की सूचना नहीं मिली है। वह हमारे पास सबसे अच्छे लोगों में से हैं।"

 माटुंगा की स्टेशन मास्टर, उनकी सहयोगी और लंबे समय से दोस्त रहीं ममता कुलकर्णी ने कहा, “त्रिवेश बहुत सज्जन हैं और हम सभी उनका सम्मान करते हैं। हम दोस्त हैं हालांकि अब हम एक-दूसरे से एक हजार किलोमीटर दूर काम करते हैं।”

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

प्वाइंटसमेन की ड्यूटी

 प्वाइंटसमेन की ड्यूटी लिस्ट (list of Pointsman Duty)

1. ऑन ड्यूटी स्टेशन मास्टर के अधीन सभी कार्य एंव बताये गये सभी निर्देशों का पालन करना।
2. सभी प्रकार के शंटिंग कार्य निस्पादित करना।
3. रोड साइड स्टेशनो पर ट्रेन के लोको पायलट एवं गार्ड के लाईन बाक्स को उतारना एवं चढाना।
4. आउट रिपोर्ट, कॉशन आर्डर एवं अन्य मेमो को देना।
5. स्टेशन के सभी रिकार्ड को सुरक्षित एवं सुसज्जित करना।
6. प्वाइन्ट मे बैलास्ट एवं गेट पर चक रेल को साफ करना।
7. संरक्षा उपकरण की साफ-सफाई एवं स्टेशन कार्यालय में स्टेशन मास्टर की सहायता करना।
8. ऑफ साइड से, आती हुई गाडी को ऑल राइट सिग्नल का आदान प्रदान करके एल वी / टेल बोर्ड को देखना।
9. असामान्य परिस्थितियो मे गेट क्रेंक हेन्डल, प्वाइन्ट क्रेंक हेन्डल एवं गाडियो को पायलट करना।
10. ट्रेन इनटेक्ट एवं शंटिंग आर्डर पर गार्ड से हस्ताक्षर कराना।
11. पैसेन्जर ट्रेन से कैश बैग एवं अन्य पार्सल / लैगेज, न्यूज पेपर आदि हेतु ब्रेक वान अटैन्ड करना।
12. बिना चार्ज दिये कार्य मुक्त नही होना, चार्ज पूर्णतः फिजीकली देना।
13. ट्रेक सर्किट, सिग्नल, ब्लाक उपकरण खराव होने पर विशेष डयूटी एवं लगातार सतत्‌ एवं सजग रहना।
14. ऑन ड्यूटि स्टेशन मास्टर द्वारा नामित डयूटी भी डयूटी लिस्ट में शामिल किये जायेंगे।
15. ब्लॉक के दौरान आइसोलेटर को खोलना एवं बंद करना।
16. घायल यात्रियो की सहायता हेतु विशेष डयूटी नामित
17. ड्यूटी के दौरान प्वाइन्ट फ्लैसिंग के मामले में तुरन्त प्वाइन्ट पर जाना।
18. ट्रेक ड्रॉप के मामले में रेल पथ का फिजिकली निरीक्षण करना की रेल फैक्चर तो नही है।
19. लोड स्टेवल के दौरान गुटके एवं जंजीर बांधना, ब्रेक कसने एवं खोलने मे गार्ड एवं लोको पायलट की सहायता करना।
20. टी. आई द्वारा काउन्सिलिंग में साइट पर जा कर क्रैंक हैन्डल, आइसोलेटर, गेट क्रैंक हैन्डल आदि का प्रशिक्षण लेना एवं स्वयं संचालित करके देखना।
21. प्वाइन्ट डिसकनेक्शन के दौरान प्वाइन्ट पर सजग रहना एवं आवश्यकता अनुसार प्वाइन्ट क्लेम्प करना एवं खोलना।

Source - G&SR of NCR 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

साईकिल की सवारी कहानी

साईकिल की सवारी

गवान ही जानता है कि जब मैं किसी को साइकिल की सवारी करते या हारमोनियम बजाते देखता हूं तब मुझे अपने ऊपर कैसी दया आती है. सोचता हूं, भगवान ने ये दोनों विद्याएं भी क्या ख़ूब बनाई हैं. एक से समय बचता है, दूसरी से समय कटता है. मगर तमाशा देखिए, हमारे प्रारब्ध में कलियुग की ये दोनों विद्याएं नहीं लिखी गईं. न साइकिल चला सकते हैं, न हारमोनियम ही बजा सकते हैं. पता नहीं, कब से यह धारणा हमारे मन में बैठ गई है कि हम सब कुछ कर सकते हैं, मगर ये दोनों काम नहीं कर सकते हैं.

शायद 1932 की बात है कि बैठे-बैठे ख़्याल आया कि चलो साइकिल चलाना सीख लें. और इसकी शुरुआत यों हुई कि हमारे लड़के ने चुपचुपाते में यह विद्या सीख ली और हमारे सामने से सवार होकर निकलने लगा. अब आपसे क्या कहें कि लज्जा और घृणा के कैसे कैसे ख़्याल हमारे मन में उठे. सोचा, क्या हमीं जमाने भर के फिसड्डी रह गए हैं! सारी दुनिया चलाती है, ज़रा ज़रा से लड़के चलाते हैं, मूर्ख और गंवार चलाते हैं, हम तो परमात्मा की कृपा से फिर भी पढ़े लिखे हैं. क्या हमीं नहीं चला सकेंगे? आख़िर इसमें मुश्किल क्या है? कूदकर चढ़ गए और ताबड़तोड़ पांव मारने लगे. और जब देखा कि कोई राह में खड़ा है तब टन टन करके घंटी बजा दी. न हटा तो क्रोधपूर्ण आंखों से उसकी तरफ़ देखते हुए निकल गए. बस, यही तो सारा गुर है इस लोहे की सवारी का. कुछ ही दिनों में सीख लेंगे. बस महाराज, हमने निश्चय कर लिया कि चाहे जो हो जाए, परवाह नहीं.

दूसरे दिन हमने अपने फटे पुराने कपड़े तलाश किए और उन्हें ले जाकर श्रीमतीजी के सामने पटक दिया कि इनकी ज़रा मरम्मत तो कर दो. ‌

श्रीमती जी ने हमारी तरफ़ अचरज भरी दृष्टि से देखा और कहा ‘इन कपड़ों में अब जान ही कहा है कि मरम्मत करूं! इन्हें तो फेंक दिया था. आप कहां से उठा लाए? वहीं जाकर डाल आइए.’ ‌

हमने मुस्कुराकर श्रीमतीजी की तरफ़ देखा और कहा, ‘तुम हर समय बहस न किया करो. आख़िर मैं इन्हें ढूंढ़ ढांढ़ कर लाया हूं तो ऐसे ही तो नहीं उठा लाया. कृपा करके इनकी मरम्मत कर डालो.’ ‌

मगर श्रीमती जी बोलीं, ‘पहले बताओ, इनका क्या बनेगा?’ ‌

हम चाहते थे कि घर में किसी को कानोंकान खबर न हो और हम साइकिल सवार बन जाएं. और इसके बाद जब इसके पंडित हो जाएं तब एक दिन जहांगीर के मकबरे को जाने का निश्चय करें. घरवालों को तांगे में बिठा दें और कहें, ‘तुम चलो हम दूसरे तांगे में आते हैं.’ जब वे चले जाएं तब साइकिल पर सवार होकर उनको रास्ते में मिलें. हमें साइकिल पर सवार देखकर उन लोगों की क्या हालत होगी! हैरान हो जाएंगे, आंखें मल-मल कर देखेंगे कि कहीं कोई और तो नहीं! परंतु हम गर्दन टेढ़ी करके दूसरी तरफ़ देखने लग जाएंगे, जैसे हमें कुछ मालूम ही नहीं है, जैसे यह सवारी हमारे लिए साधारण बात है. झक मारकर बताना पड़ा कि रोज रोज तांगे का खर्च मारे डालता है. साइकिल चलाना सीखेंगे.

श्रीमती जी ने बच्चे को सुलाते हुए हमारी तरफ़ देखा और मुस्कुराकर बोलीं, ‘मुझे तो आशा नहीं कि यह बेल आपसे मत्थे चढ़ सके. खैर यत्न करके देख लीजिए. मगर इन कपड़ों से क्या बनेगा?’

हमने ज़रा रोब से कहा,‘आख़िर बाइसिकिल से एक दो बार गिरेंगे या नहीं? और गिरने से कपड़े फटेंगे या नहीं? जो मूर्ख हैं, वो नए कपड़ों का नुकसान कर बैठते हैं. जो बुद्धिमान हैं, वो पुराने कपड़ों से काम चलाते हैं.

मालूम होता है हमारी इस युक्ति का कोई जवाब हमारी स्त्री के पास न था, क्योंकि उन्होंने उसी समय मशीन मंगवाकर उन कपड़ों की मरम्मत शुरू कर दी.

हमने इधर बाजार जाकर जंबक के दो डिब्बे खरीद लिए कि चोट लगते ही उसी समय इलाज किया जा सके. इसके बाद जाकर एक खुला मैदान तलाश किया, ताकि दूसरे दिन से साइकिल-सवारी का अभ्यास किया जा सके.

अब यह सवाल हमारे सामने था कि अपना उस्ताद किसे बनाएं. इसी उधेड़बुन में बैठे थे कि तिवारी लक्ष्मीनारायण आ गए और बोले,‘क्यों भाई हो जाए एक बाजी शतरंज की?’

हमने सिर हिलाकर जवाब दिया, ‘नहीं साहब! आज तो जी नहीं चाहता.’

‘क्यों?’

‘यदि जी न चाहे तो क्या करें?’

यह कहते कहते हमारा गला भर आया. तिवारी जी का दिल पसीज गया. हमारे पास बैठकर बोले, ‘अरे भाई मामला क्या है? स्त्री से झगड़ा तो नहीं हो गया?’

हमने कहा, ‘तिवारी भैया, क्या कहें? सोचा था, लाओ, साइकिल की सवारी सीख लें. मगर अब कोई ऐसा आदमी दिखाई नहीं देता जो हमारी सहायता करे. बताओ, है कोई ऐसा आदमी तुम्हारे ख़्याल में?’

तिवारी जी ने हमारी तरफ़ बेबसी की आंखों से ऐसे देखा, मानों हमको कोई खजाना मिल रहा है और वे खाली हाथ रह जाते हैं. बोले, ‘मेरी मानो तो यह रोग न पालो. इस आयु में साइकिल पर चढ़ोगे? और यह भी कोई सवारियों में कोई सवारी है कि डंडे पर उकड़ूं बैठे हैं और पांव चला रहे हैं. अजी लानत भेजो इस ख़्याल पर आओ एक बाजी खेलें.’ मगर हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थी. साफ समझ गए कि तिवारी ईर्ष्या की आग में फुंका जाता है. मुंह फुलाकर हमने कहा, ‘भाई तिवारी हम तो जरूर सीखेंगे. कोई आदमी बताओ.’

‘आदमी तो है ऐसा एक, मगर वह मुफ्त में नहीं सिखाएगा. फीस लेगा. दे सकोगे?’

‘कितने दिन में सिखा देगा?’

‘यही दस-बारह दिनों में!’

‘और फीस क्या लेगा हमसे?’

‘औरों से पचास लेता है. तुमसे बीस ले लेगा हमारी खातिर.’

हमने सोचा दस दिन सिखाएगा और बीस रुपये लेगा. दस दिन बीस रुपये. बीस रुपये-दस दिन. अर्थात् दो रुपये रोजाना अर्थात् साठ रुपये महीना और वो भी केवल एक दो घंटे के लिए. ऐसी तीन चार ट्यूशनें मिल जाएं तो ढाई-तीन सौ रुपये मासिक हो जाएंगे. हमने तिवारी जी से तो इतना ही कहा कि जाओ जाकर मामला तय कर आओ, मगर जी में खुश हो रहे थे कि साइकिल चलाना सीख गए तो एक ट्रेनिंग स्कूल खोल दें और तीन-चार सौ रुपये मासिक कमाने लगे.

इधर तिवारी जी मामला तय करने गए इधर हमने यह शुभ समाचार जाकर श्रीमती जी को सुना दिया कि कुछ दिनों में हमलोग ऐसा स्कूल खोलने वाले हैं जिससे तीन-चार सौ रुपये मासिक आमदनी होगी.

श्रीमती जी बोली, ‘तुम्हारी इतनी आयु हो गई मगर ओछापन न गया. पहले आप तो सीख लो, फिर स्कूल खोलना. मैं तो समझती हूं कि तुम ही न सीख सकोगे दूसरों को सिखाना तो दूर की बात है.’

हमने बिगड़कर कहा, ‘यह बड़ी बुरी बात है कि हर काम में टोक देती हो. हमसे बड़े बड़े सीख रहे हैं तो क्या हम न सीख सकेंगे? पहले तो शायद सीखते या न सीखते, पर अब तुमने टोका है तो जरूर सीखेंगे. तुम भी क्या कहोगी.’

श्रीमती जी बोली, ‘मैं तो चाहती हूं कि तुम हवाई जहाज चलाओ. यह बाइसिकिल क्या चीज है? मगर तुम्हारे स्वभाव से डर लगता है. एक बार गिरोगे, तो देख लेना वहीं साइकिल फेंक-फांककर चले आओगे.’

इतने में तिवारी जी ने बाहर से आवाज दी. हमने बाहर जाकर देखा तो उस्ताद साहब खड़े थे. हमने शरीफ विद्यार्थियों के समान श्रद्धा से हाथ जोड़ का प्रणाम किया और चुपचाप खड़े हो गए।

तिवारी जी बोले, ‘यह तो बीस पर मान ही नहीं रहे थे. बड़ी मुश्किल से मनाया है. पेशगी लेंगे. कहते हैं, पीछे कोई नहीं देता.’

अरे भाई हम देंगे. दुनिया लाख बुरी है, मगर फिर भी भले आदमियों से खाली नहीं है. यह बस चलाना सीखा दें, फिर देखें, हम इनकी क्या क्या सेवा करते हैं.’

मगर उस्ताद साहब नहीं माने. बोले, ‘फीस पहले लेंगे.’

‘और यदि आपने नहीं सिखाया तो?’

‘नहीं सिखाया तो फीस लौटा देंगे.’

‘और यदि नहीं लौटाया तो?’

इस पर तिवारी जी ने कहा, ‘अरे साहब! क्या यह तिवारी मर गया है? शहर में रहना हराम कर दूं, बाजार में निकलना बंद कर दूं. फीस लेकर भाग जाना कोई हंसी-खेल है?’

जब हमें विश्वास हो गया कि इसमें कोई धोखा नहीं है, तब हमने फीस के रुपये लाकर उस्ताद को भेंट कर दिए और कहा, ‘उस्ताद कल सवेरे ही आ जाना. हम तैयार रहेंगे. इस काम के लिए कपड़े भी बनवा लिए हैं. अगर गिर पड़े तो चोट पर लगाने के लिए जंबक भी खरीद लिया है. और हां हमारे पड़ोस में जो मिस्त्री रहता है, उससे साइकिल भी मांग ली है. आप सवेरे ही चले आएं तो हरि नाम लेकर शुरू कर दें.’

तिवारी जी और उस्ताद जी ने हमें हर तरह से तसल्ली दी और चले गए. इतने में हमें याद आया कि एक बात कहना भूल गए. नंगे पांव भागे और उन्हें बाजार में जाकर पकड़ा. वे हैरान थे. हमने हांफते-हांफते कहा, ‘उस्ताद हम शहर के पास नहीं सीखेंगे, लारेंसबाग में जो मैदान है, वहां सीखेंगे. वहां एक तो भूमि नरम है, चोट कम लगती है. दूसरे वहां कोई देखता नहीं है.’

अब रात को आराम की नींद कहां? बार बार चौंकते थे और देखते थे कि कहीं सूरज तो नहीं निकल आया. सोते थे तो साइकिल के सपने आते थे. एक बार देखा कि हम साइकिल से गिरकर जख्मी हो गए हैं. साइकिल आप से आप हवा में चल रही है और लोग हमारी तरफ़ आंखें फाड़-फाड़ के देख रहे थे.

अब आंखें खुली तो दिन निकल आया था. जल्दी से जाकर वो पुराने कपड़े पहन लिए, जंबक का डिब्बा साथ में ले लिया और नौकर को भेज कर मिस्त्री से साइकिल मंगवा ली. इसी समय उस्ताद साहब भी आ गए और हम भगवान का नाम लेकर लारेंसबाग की ओर चले. लेकिन अभी घर से निकले ही थे कि एक बिल्ली रास्ता काट गई और लड़के ने छींक दिया. क्या कहें कि हमें कितना क्रोध आया उस नामुराद बिल्ली पर और उस शैतान लड़के पर! मगर क्या करते?दांत मगर क्या करते?दांत पीसकर रहे गए. एक बार फिर भगवान का पावन नाम लिया और आगे बढ़े. पर बाजार में पहुंच कर देखते हैं कि हर आदमी हमारी तरफ़ देख रहा है और हंस रहा है. अब हम हैरान थे कि बात क्या है. सहसा हमने देखा कि हमने जल्दी और घबराहट में पाजामा और अचकन दोनों उलटे पहन लिए हैं और लोग इसी पर हंस रहे हैं.

सर मुंड़ाते ही ओले पड़े.
हमने उस्ताद से माफी मांगी और घर लौट आए अर्थात् हमारा पहला दिन मुफ्त में गुज़रा.
दूसरे दिन फिर निकले. रास्ते में उस्ताद साहब बोले, ‘मैं एक गिलास लस्सी पी लूं. आप ज़रा साइकिल को थामिए.’
उस्ताद साहब लस्सी पीने लगे तो हमने साइकिल के पुर्जों की ऊपर-नीचे परीक्षा शुरू कर दी. फिर कुछ जी में आया तो उसका हैंडल पकड़ कर चलने लगे. मगर दो ही कदम गए होंगे कि ऐसा मालूम हुआ जैसे साइकिल हमारे सीने पर चढ़ी आती है.
इस समय हमारे सामने गंभीर प्रश्न यह था कि क्या करना चाहिए? युद्ध क्षेत्र में डटे रहें या हट जाएं? सोच विचार के बाद यही निश्चय हुआ कि यह लोहे का घोड़ा है. इसके सामने हम क्या चीज हैं. बड़े-बड़े वीर योद्धा भी ठहर नही सकते. इसलिए हमने साइकिल छोड़ दी और भगोड़े सिपाही बनकर मुड़ गए. पर दूसरे ही क्षण साइकिल पूरे जोर से हमारे पांव पर गिर गई और हमारी रामदुहाई बाजार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक गूंजने लगी. उस्ताद लस्सी छोड़कर दौड़े आए और अन्य दयावान लोग भी जमा हो गए. सबने मिलकर हमारा पांव साइकिल से निकाला. भगवान के एक भक्त ने जंबक का डिब्बा भी उठाकर हमारे हाथ में दे दिया. दूसरे ने हमारी बगलों में हाथ डालकर हमें उठाया और सहानुभूति से पूछा, ‘चोट तो नहीं आई? ज़रा दो चार कदम चलिए नहीं तो लहू जम जाएगा.’
इस तरह दूसरे दिन भी हम और हमारी साइकिल दोनों अपनी घर से थोड़ी दूर पर जख्मी हो गए. हम लंगड़ाते हुए घर लौट आए और साइकिल ठीक होने के लिए मिस्त्री के दुकान पर भेज दी.
मगर हमारे वीर हृदय का साहस और धीरज तो देखिए. अब भी मैदान में डटे रहे. कई बार गिरे, कई बार शहीद हुए. घुटने तुड़वाए, कपड़े फड़वाए पर क्या मजाल जो जी छूट जाए. आठ-नौ दिनों में साइकिल चलाना सीख गए थे. लेकिन अभी उस पर चढ़ना नहीं आता था. कोई परोपकारी पुरुष सहारा देकर चढ़ा देता तो फिर लिए जाते थे. हमारे आनंद की कोई सीमा न थी. सोचा मार लिया मैदान हमने. दो चार दिन में पूरे मास्टर बन जाएंगे, इसके बाद प्रोफेसर प्रिंसिपल, इसके बाद ट्रेनिंग कॉलेज फिर तीन-चार सौ रुपये मासिक. तिवारी जी देखेंगे और ईर्ष्या से जलेंगे.
उस दिन उस्ताद जी ने हमें साइकिल पर चढ़ा दिया और सड़क पर छोड़ दिया कि ले जाओ, अब तुम सीख गए.
Kahani



अब हम साइकिल चलाते थे और दिल ही दिल फूले न समाते थे. मगर हाल यह था कि कोई आदमी सौ गज के फासले पर होता तो हम गला फाड़-फाड़कर चिल्लाना शुरू कर देते-साहब! बाईं तरफ़ हट जाइए. दूर फासले पर कोई गाड़ी दिख जाती तो हमारे प्राण सूख जाते. उस समय हमारे मन की जो दशा होती वो परमेश्वर ही जानता है. जब गाड़ी निकल जाती तब कहीं जाकर हमारी जान में जान आती. सहसा सामने से तिवारी जी आते हुए दिखे. हमने उन्हें भी दूर से ही अल्टीमेटम दिया कि तिवारी जी, बाईं तरफ़ हो जाओ, वरना साइकिल तुम्हारे ऊपर चढ़ा देंगे.
तिवारी जी ने अपनी छोटी छोटी आंखों से हमारी तरफ़ देखा और मुस्कुराकर कहा, ‘ज़रा एक बात तो सुनते जाओ.’
हमने एक बार हैंडल की तरफ़, दूसरी बार तिवारी जी की तरफ़ देखकर कहा, ‘इस समय बात सुन सकते हैं? देखते नहीं हो साइकिल पर सवार हैं.’
तिवारी जी बोले, ‘तो क्या जो साइकिल चलाते हैं, वो किसी की बात नहीं सुनते हैं? बड़ी जरूरी बात है, ज़रा उतर आओ.
हमने लड़खड़ाती हुई साइकिल को संभालते हुए जवाब दिया, ‘उतर आएंगे तो चढ़ाएगा कौन? अभी चलाना सीखा है चढ़ना नहीं सीखा.’
तिवारी जी चिल्लाते ही रह गए, हम आगे निकल गए.
इतने में सामने से एक तांगा आता दिखाई दिया. हमने उसे भी दूर से ही डांट दिया, ‘बाईं तरफ़ भाई. अभी नए चलाने वाले हैं.’
तांगा बाईं तरफ़ हो गया. हम अपने रास्ते चले जा रहे थे. एकाएक पता नहीं घोड़ा भड़क उठा या तांगेवाले को शरारत सूझी, जो भी हो, तांगा हमारे सामने आ गया. हमारे हाथ पांव फूल गए. ज़रा सा हैंडल घुमा देते तो हम दूसरी तरफ़ निकल जाते. मगर बुरा समय आता है तो बुद्धि पहले ही भ्रष्ट हो जाती है. उस समय हमें ख़्याल ही न आया कि हैंडल घुमाया भी जा सकता है. फिर क्या था, हम और हमारी साइकिल दोनों ही तांगे के नीचे आ गए और हम बेहोश हो गए.
जब हम होश में आए तो हम अपने घर में थे और हमारी देह पर कितनी ही पट्टियां बंधी थीं. हमें होश में देखकर श्रीमतीजी ने कहा, ‘क्यों? अब क्या हाल है? मैं कहती न थी, साइकिल चलाना न सीखो! उस समय तो किसी की सुनते ही न थे.’
हमने सोचा, लाओ सारा इल्जाम तिवारी जी पर लगा दें और आप साफ बच जाएं. बोले, ‘यह सब तिवारी जी की शरारत है.’
श्रीमती जी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘यह तो तुम उसको चकमा दो जो कुछ जानता न हो. उस तांगे पर मैं ही तो बच्चों को लेकर घूमने निकली थी कि चलो सैर भी कर आएंगे और तुम्हें साइकिल चलाते भी देख आएंगे.
हमने निरुत्तर होकर आंखें बंद कर लीं.
उस दिन के बाद फिर कभी हमने साइकिल को हाथ न लगाया.

रविवार, 23 अक्टूबर 2022

बचपन की यादें, मैंने साईकिल चलाना कैसे सीखा?

बचपन की यादें...

मैंने साइकिल चलाना कैसे सीखा?
उस समय साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पिताजी या चाचा चलाया करते थे तब साइकिल की ऊंचाई 40 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना संभव नहीं होता था...
"हमने कैंची चलाना सीखा"
"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे। आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से मरहूम है उन्हे नहीं पता की आठ दस साल की उमर में 40 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था। हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तोड़वाए हैं और गज़ब की बात ये है कि तब दर्द भी नहीं होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपने हाफ कच्छे को पोंछते हुए।
अब तकनीकी ने बहुत विकास कर लिया है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो–दो फिट की साइकिल आ गयी है, और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में....
मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! "जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं।
इधर से चक्की तक साइकिल लुढकाते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए! इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी। और ये भी सच है की हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी, हम लोग इस दुनिया की वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
पहला चरण कैंची
दूसरा चरण डंडा
तीसरा चरण गद्दी
(फिर बादशाहों वाली फीलिंग्स)
हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी, पहला चरण कैंची और दूसरा चरण डंडा तीसरा चरण गद्दी.....

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोतम।


महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत।

।।१।।

अयि गिरि नन्दिनी नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।

गिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनी विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ-  हे हिमालायराज की कन्या, विश्व को आनंद देने वाली, नंदी गणों के द्वारा नमस्कृत, गिरिवर विन्ध्याचल के शिरो (शिखर) पर निवास करने वाली, भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाली, इन्द्रदेव के द्वारा नमस्कृत, भगवान् नीलकंठ की पत्नी, विश्व में विशाल कुटुंब वाली और विश्व को संपन्नता देने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली भगवती! अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


 ।।२।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।

त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवों को वरदान देने वाली, दुर्धर और दुर्मुख असुरों को मारने वाली और स्वयं में ही हर्षित (प्रसन्न) रहने वाली, तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को संतुष्ट करने वाली, पापों को हरने वाली और घोर गर्जना करने वाली, दानवों पर क्रोध करने वाली, अहंकारियों के घमंड को सुखा देने वाली, समुद्र की पुत्री हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।३।।

अयि जगदम्बमदम्बकदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते ।

शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते ।।

मधुमधुरे मधुकैटभगन्जिनि कैटभभंजिनि रासरते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- हे जगतमाता, मेरी माँ, प्रेम से कदम्ब के वन में वास करने वाली, हास्य भाव में रहने वाली, हिमालय के शिखर पर स्थित अपने भवन में विराजित, मधु (शहद) की तरह मधुर, मधु-कैटभ का मद नष्ट करने वाली, महिष को विदीर्ण करने वाली,सदा युद्ध में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।४।।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते ।

रिपु गजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।।

निजभुज दण्ड निपतित खण्ड विपातित मुंड भटाधिपते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शत्रुओं के हाथियों की सूंड काटने वाली और उनके सौ टुकड़े करने वाली, जिनका सिंह शत्रुओं के हाथियों के सर अलग अलग टुकड़े कर देता है, अपनी भुजाओं के अस्त्रों से चण्ड और मुंड के शीश काटने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।५।।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।

चतुरविचारधुरीणमहाशिव दूतकृत प्रथमाधिपते ।।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- रण में मदोंमत शत्रुओं का वध करने वाली, अजर अविनाशी शक्तियां धारण करने वाली, प्रमथनाथ (शिव) की चतुराई जानकार उन्हें अपना दूत बनाने वाली, दुर्मति और बुरे विचार वाले दानव के दूत के प्रस्ताव का अंत करने वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।६।।

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे ।

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे ।।

दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शरणागत शत्रुओं की पत्नियों के आग्रह पर उन्हें अभयदान देने वाली, तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों पर प्रहार करने योग्य त्रिशूल धारण करने वाली, देवताओं की दुन्दुभी से 'दुमि दुमि' की ध्वनि को सभी दिशाओं में व्याप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।७।।

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते।

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- मात्र अपनी हुंकार से धूम्रलोचन राक्षस को धूम्र (धुएं) के सामान भस्म करने वाली, युद्ध में कुपित रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न अन्य रक्तबीजों का रक्त पीने वाली, शुम्भ और निशुम्भ दैत्यों की बली से शिव और भूत-प्रेतों को तृप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।८।।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- युद्ध भूमि में जिनके हाथों के कंगन धनुष के साथ चमकते हैं, जिनके सोने के तीर शत्रुओं को विदीर्ण करके लाल हो जाते हैं और उनकी चीख निकालते हैं, चारों प्रकार की सेनाओं [हाथी, घोडा, पैदल, रथ] का संहार करने वाली अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाले बटुकों को उत्पन्न करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।९।।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते ।

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवांगनाओं के तत-था थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली, कु-कुथ अड्डी विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले ताल वाले स्वर्गीय गीतों को सुनने में लीन, मृदंग की धू-धुकुट, धिमि-धिमि आदि गंभीर ध्वनि सुनने में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१०।।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते ।

झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जय जयकार करने और स्तुति करने वाले समस्त विश्व के द्वारा नमस्कृत, अपने नूपुर के झण-झण और झिम्झिम शब्दों से भूतपति महादेव को मोहित करने वाली, नटी-नटों के नायक अर्धनारीश्वर के नृत्य से सुशोभित नाट्य में तल्लीन रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।११।।

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते ।

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- आकर्षक कान्ति के साथ अति सुन्दर मन से युक्त और रात्रि के आश्रय अर्थात चंद्र देव की आभा को अपने चेहरे की सुन्दरता से फीका करने वाली, काले भंवरों के सामान सुन्दर नेत्रों वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१२।।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते ।

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- महायोद्धाओं से युद्ध में चमेली के पुष्पों की भाँति कोमल स्त्रियों के साथ रहने वाली तथा चमेली की लताओं की भाँति कोमल भील स्त्रियों से जो झींगुरों के झुण्ड की भाँती घिरी हुई हैं, चेहरे पर उल्लास (ख़ुशी) से उत्पन्न, उषाकाल के सूर्य और खिले हए लाल फूल के समान मुस्कान वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१३।।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गजराजपते ।

त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिसके कानों से अविरल (लगातार) मद बहता रहता है उस हाथी के समान उत्तेजित हे गजेश्वरी, तीनों लोकों के आभूषण रूप-सौंदर्य, शक्ति और कलाओं से सुशोभित हे राजपुत्री, सुंदर मुस्कान वाली स्त्रियों को पाने के लिए मन में मोह उत्पन्न करने वाली मन्मथ (कामदेव) की पुत्री के समान, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१४।।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते ।

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।।

अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनका कमल दल (पंखुड़ी) के समान कोमल, स्वच्छ और कांति (चमक) से युक्त मस्तक है, हंसों के समान जिनकी चाल है, जिनसे सभी कलाओं का उद्भव हुआ है, जिनके बालों में भंवरों से घिरे कुमुदनी के फूल और बकुल पुष्प सुशोभित हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१५।।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते।

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।।

निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनके हाथों की मुरली से बहने वाली ध्वनि से कोयल की आवाज भी लज्जित हो जाती है, जो [खिले हुए फूलों से] रंगीन पर्वतों से विचरती हुयी, पुलिंद जनजाति की स्त्रियों के साथ मनोहर गीत जाती हैं, जो सद्गुणों से सम्पान शबरी जाति की स्त्रियों के साथ खेलती हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१६।।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे।

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनकी चमक से चन्द्रमा की रौशनी फीकी पड़ जाए ऐसे सुन्दर रेशम के वस्त्रों से जिनकी कमर सुशोभित है, देवताओं और असुरों के सर झुकने पर उनके मुकुट की मणियों से जिनके पैरों के नाखून चंद्रमा की भांति दमकते हैं और जैसे सोने के पर्वतों पर विजय पाकर कोई हाथी मदोन्मत होता है वैसे ही देवी के उरोज (वक्ष स्थल) कलश की भाँति प्रतीत होते हैं ऐसी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१७।।

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते।

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सहस्रों (हजारों) दैत्यों के सहस्रों हाथों से सहस्रों युद्ध जीतने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित, सुरतारक (देवताओं को बचाने वाला) उत्पन्न करने वाली, उसका तारकासुर के साथ युद्ध कराने वाली, राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की भक्ति से सामान रूप से संतुष्ट होने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१८।।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे।

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जो भी तुम्हारे दयामय पद कमलों की सेवा करता है, हे कमला! (लक्ष्मी) वह व्यक्ति कमलानिवास (धनी) कैसे न बने? हे शिवे! तुम्हारे पदकमल ही परमपद हैं उनका ध्यान करने पर भी परम पद कैसे नहीं पाऊंगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१९।।

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् ।

भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सोने के समान चमकते हुए नदी के जल से जो तुम्हे रंग भवन में छिड़काव करेगा वो शची (इंद्राणी) के वक्ष से आलिंगित होने वाले इंद्र के समान सुखानुभूति क्यों न पायेगा? हे वाणी! (महासरस्वती) तुममे मांगल्य का निवास है, मैं तुम्हारे चरण में शरण लेता हूँ, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२०।।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते।

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखीसु मुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

ममतु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- तुम्हारा निर्मल चन्द्र समान मुख चन्द्रमा का निवास है जो सभी अशुद्धियों को दूर कर देता है, नहीं तो क्यों मेरा मन इंद्रपूरी की सुन्दर स्त्रियों से विमुख हो गया है? मेरे मत के अनुसार तुम्हारी कृपा के बिना शिव नाम के धन की प्राप्ति कैसे संभव हो सकती है? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२१।।

अयि मयि दीन दयालु-तया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे।

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।।

यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।


अर्थ- हे दीनों पर दया करने वाली उमा! मुझ पर भी दया कर ही दो, हे जगत जननी! जैसे तुम दया की वर्ष करती हो वैसे ही तीरों की वर्ष भी करती हो, इसलिए इस समय जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो मेरे पाप और ताप दूर करो, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय  हो।

  कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक- घाघ के नीतिपरक दोहे ----------------------------------------------- 1- चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ मे...