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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

कौन है स्टेशन मास्टर ?

कौन है स्टेशन मास्टर ?
    भारतीय रेलवे का सबसे महत्वपूर्ण कर्मचारी जो बहुप्रशिक्षित,अत्यन्त समझदार, तीव्र बुद्धि वाला व्यक्ति होता है। सामान्यत: बहुआयामी कार्यों को अंजाम देने वाला और विपरीत परिस्थितियों में बिल्कुल सटीक निर्णय लेनेवाला महामानव है।
चयन कैसे होता है?
इसका चयन RRB के माध्यम से होता है।
डिविजन की आवश्यकता >
RRB को अनुदेश >
रिक्तियाँ प्रकाशित करना >
अभ्यर्थियों द्वारा आवेदन >
परीक्षा(दो चरणों में) >
मनोवैग्यानिक परीक्षण >
प्रमाण पत्रों की जांच >
अन्तरिम चयन >
डिविजन को सौपना >
चिकित्सकिय जांच >
बाँड भरना >
ट्रेनिंग >
स्टेशन पे पदस्थापना।
[ बाँड :- आपको कोर्ट से एक बाँड पेपर बनवाकर देना होगा कि "आप 5 साल तक लगातार कार्य करेंगे और नौकरी छोड़ कर नही भागेंगे]
> ये बहुत आसान कार्य है।
> कोर्ट में नोटरी से बनवाना होगा।
> 200/- तक व्यय होगा।
> वकील सारा कार्य करवा देगा।
> 2 गवाहों की आवश्यकता होगी।
> ओरिजनल प्रति रेलवे को सौपनी होगी।
ट्रेनिंग कैसे होती है?
> आप रेलवे के किसी भी पद पर कार्य करें. उससे पहले समुचित ट्रेनिंग होती है।
> ट्रेनिंग रेलवे के जोनल रेलवे ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में दी जाती है।
> ट्रेनिंग के बाद परीक्षा ली जाती है।
> पास होने के बाद आपके पद से संबंधित सक्षमता प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है।
> अनुतीर्ण होने पर फ़िर से परीक्षा देना होगा। दोबारा से अनुत्तीर्ण होने पर नौकरी से बाहर जाईये।
> वर्तमान में देश के विभिन्न जोनों में SM की ट्रेनिंग 100 -120 दिन तक होती है।
> ट्रेनिंग के तहत SM के आपरेटिंग के कार्य के थ्योरी क्लासेस, प्रैक्टिकल क्लासेस और स्टेशन पे भेजकर भी ट्रेनिंग दी जाती है।
> ट्रेनिंग के दौरान आपको बेसिक पे दिया जाता है।

वेतन और अन्य सुविधायें :-
> अभी SM का बेसिक पे 4200 GP (6ठा वेतनमान के अनुसार) या 35,400 (7वां वेतनमान के अनुसार) हैं।
> इसमे महँगाई भत्ता, रात्रिकालीन ड्यूटी भत्ता, आवास भत्ता इत्यादि जोड़कर दिया जाता है।
> वर्तमान में आपको पहला वेतन 38,000/- के आस पास मिलेगा।
> आप चाहे तो रहने के लिये आवास/क्वार्टर मिलेगा।(क्वार्टर लेने पर आवास भत्ता नही मिलेगा)
> आपको आपके पत्नी, बच्चों, विधवा माँ, दिव्याँग/आश्रित/अविवाहित भाई-बहन के लिये सलाना एक पास(अप एंड डाऊन दोनों) और 4 पी.टी.ओ मिलेंगे।
(पास में 100% मुफ़्त यात्रा, पी.टी.ओ में यात्रा का 30% भाड़ा आप देंगे -70% रेलवे देगी।) 
> 5 साल की लगातार नौकरी के बाद प्रतिवर्ष 3 पास मिलेंगे।

सम्मान :–
स्टेशन मास्टर का समाज में आज भी बहुत सम्मान हैं. अगर आपका स्टेशन किसी गाँव में हैं तो आपका सम्मान किसी बैंक के शाखा पदाधिकारी/स्कूल के हेड मास्टर / VRO / सरपंच के समकक्ष ही होता है।

प्राथमिक कार्य :-
SM का मुख्य कार्य रेलगाड़ी को पिछले स्टेशन से लेकर अगले स्टेशन तक सकुशल पहुँचाना है। इसके अतिरिक्त छोटे स्टेशनो पर टिकट विक्रय करना भी है।
(अन्य कार्यों को विस्तार पूर्वक आगे समझेंगे, जब उनकी कठिनाईयों के बारे में पढ़ेंगे)

समस्याएं और कठिनाइयां :–
        मानता हूं कि भारत के अधिकांश सरकारी या प्राईवेट नौकरी में वर्क लोड, छुट्टी, सीनियर का दबाव इत्यादि बहुत सी समस्यायें हैं। बहुत से लोग दिन रात मेहनत कर रहें हैं। कुछ आराम भी फरमा रहे हैं। बैंक पीओ, पुलिस, लोको पायलेट, गार्ड इत्यादि की समस्याओं के बारे में सारा समाज जानता है। लेकिन स्टेशन मास्टर एक ऐसी उपेक्षित कैटगरी है जो दिन-रात मेहनत करते हैं लेकिन लोग उसे आराम करने वाले अधिकारी के तौर पे ही जानते हैं।

कार्य :–
> ब्लॉक इन्स्ट्रूमेंट, पैनल इत्यादि की सहायता से ट्रेनों के यातायात का प्रत्यक्ष प्रचालन करना।
> सारे सिग्नलों को आपरेट करना।
 (और बाहरी दुनिया के लोग समझते हैं की ये काम सिग्नल मेन्टेनर का है। जबकि उसका कार्य केवल नियमित समय पर सिग्नलो और संबंधित यन्त्रों का अनुरक्षण/मेन्टेनेंस करना एवं अचानक कुछ खराबी आने पर ठीक करना भर हैं)
कुछ मिलाकर अगर स्टेशन मास्टर कार्य करने वाला साफ्टवेयर इंजीनियर हैं तो सिग्नल मेन्टेनर खराबी ठीक करने वाला हार्डवेयर इंजीनियर की भाँति हैं।
> बहुत सी डायरी और रजिस्टरों में इंट्री करना -ना केवल ट्रेन के यातयात बल्कि अन्य बातों के लिये भी 78 अलग अलग रजिस्टर होते हैं. एक भी इंट्री छूटने या गलत लिखे जाने पर चार्जशीट और पनिसमेंट का भय रहता है।
> रात में सारे सिग्नल स्टाफ़, गैंग स्टाफ, की मैन, आरपीएफ इत्यादि ड्यूटी पर भी‌ सोते मिलेंगे, काम करते हैं तो केवल स्टेशन मास्टर, कंट्रोलर, प्वाइंट्स मेन, गार्ड, और लोको पायलट।
रात के समय में जब आप AC कोच में सोते हुए यात्रा करते हैं और सुबह ट्रेन से उतरकर कहते हैं की की मैं लंबी यात्रा से थक गया और एक दिन आराम करूँगा, तभी आप अवश्य सोचिये आपके जैसा एक इंसान रात भर बिना एक मिनट बैठे लगातार 10 घंटे तक पूरे ऑफिस में और ऑफिस के बाहर बार बार दौड़ दौड़ कर काम करता रहता है।
अगर कोई इंसान एक रात किसी विवाह की बारात में जागता है तो अगले 2 दिनो तक दिन भर सोता ही रहता है।
और वहीं SM लगातार 7 दिनों तक नाइट ड्यूटी करते हैं।
 
SM का वास्त्विक कार्य तो दिल दहला देने वाला है :-
> मान लिजिये A B C D तीन लगातार स्टेशन हैं, और आप स्टेशन C के स्टेशन मास्टर हैं। तो,
> जैसे ही स्टेशन A से ट्रेन खुलेगी. स्टेशन B वाला SM एक मशीन का बटन दबायेगा. जिससे आपके स्टेशन पर एक घंटी बजेगी.
> आप तुरंत दौड़कर उस मशीन के पास जायेंगे और एक बटन दबायेंगे. जिससे उसके पास एक घंटी बजेगी।
> स्टेशन -B :- मेरे पास एक ट्रेन है, 12310 डाउन पटना राजधानी एक्सप्रेस, भेजना चाहता हूँ, अनुमति (लाईन क्लियर) दिजिये।
 आप (स्टेशन -C) :- आप 2 मिनट इन्तजार करें।
> आप 2 मिनट में स्टेशन B. और स्टेशन C के बीच के सारे रेलवे फाटक/गेट को बंद करवाते हैं और अन्य अनिवार्य बातों पर भी गौर करते हैं।
> अब आप पिछले स्टेशन-B को एक भारी मशीन की घुन्डी घुमाकर लाईन क्लीयर देंगे।
> आप लाइन क्लीयर देंगे उसके बाद ही वो सिग्नल को हरा (green light ) कर पायेगा. जिसे देखकर लोको पायलट ट्रेन उस स्टेशन -B को पार कर पायेगा।
> 5 - 7 मिनट के बाद ट्रेन उसके स्टेशन से बढकर जैसे ही आगे निकलेगी, आपके स्टेशन में एक मशीन से जोर से आवाज आने लगेगी।
> अब आप सेक्शन कंट्रौल को फ़ोन करेंगे कि क्या करना है?
वो बताएंगे कि ट्रेन को थ्रू करना है या, किसी अन्य ट्रेन के इंतजार में उसे लूप लाइन में रीसिव करके अगले आदेश तक रखना है।
(प्राय : गुड्स ट्रेन या, पैसेंजर ट्रेन को लूप में घुसा दिया जाता है और सुपरफास्ट ट्रेन को मैन लाईन से थ्रू किया जाता है।)
>थ्रू ट्रेन को SM दिन में अपने रूम से निकलकर झंडा (हरा/लाल) और रात में सिग्नल दिखाता है। ऐसा सिग्नल एक्सचेंज नही करने पर अगर कोई(LP या, GG) शिकायत कर दे तो दंड निर्धारित हैं।
[ जिन लोगों की आँखे दोषपूर्ण हैं या, कलर ब्लाइंड हैं वो लाल और हरा में भेद नही कर पाएंगे।
ऐसे में वो कैसे लाल या हरा सिग्नल / झंडा पहचानेंगे।
क्या वो ट्रेन में बैठे हजारो यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ नहीं करेंगे?
अगर वो आगे ट्रेन होने पर भी लाल रंग को हरा समझ लाल (वास्तव में हरा) सिग्नल दे दें तो ट्रेन रूकने के बजाय दौड़ेगी और क्या होगा?
हालांकि हमारा सिग्नलिंग सिस्टम ऐसी गलती को नहीं होने देगा।
मेरी नेत्र दोष वाले भाईयों से हाथ जोड़ कर विनती है कि आप चालाकी करके SM चुने जाने के लिए अन्यायपूर्ण /अनैतिक प्रयास ना करें। सच्चाई को स्वीकारें और देशहित वाले कार्य ही करें।
> यही प्रक्रिया
 चलती रहती है और ट्रेन कश्मीर से कन्याकुमारी तक पहुँच जाती है।
> पर्व में छुटटी नहीं मिलती, मिलता है तो स्पेशल ट्रेन के रूप में अतिरिक्त वर्क लोड।
> छुट्टी की इतनी किल्लत हैं की पास -पीटीओ धरे ही रह जाते हैं। और अगर टिकट लिया तो अधिकतर कैंल ही कराना पड़ सकता है।
> हर ट्रेन को झंडा दिखाना (अगर ना दिखाया और ट्रेन में बैठे किसी अधिकारी ने देख लिया, या किसी कर्मचारी(LP या GG) ने शिकायत कर दी तो सजा मिलनी तय हैं।
ये सजा कम से कम साल भर या उससे भी अधिक दिन तक इंक्रीमेन्ट कट के रूप में मिलती हैं अर्थात कम से कम 24 हजार की हानि।
-भारत के 7800 रेलवे स्टेशन में से आज भी 5000 से ज्यादा स्टेशन में "स्टेशन मास्टर" को ही टिकट जारी करने का अतिरिक्त कार्य दिया गया है। जबकि टिकट लेने वालो की भीड़ बहुत बढ चुकी है। लोगों को टिकट देने में बक-झक होना आम बात है। इसी बीच अगर ट्रेन ऑपरेटिंग में देर हो जाये या किसी कमर्शियल कार्य में कुछ गलती हो जाये तो स्टेशन मास्टर को ही सज़ा मिलती है। आप विश्वास नही करेंगे ना केवल सिस्टम ओपेन कर टिकट बेचना होता है बल्कि उनका पक्का रिकार्ड भी रजिस्टर में तैयार करना होता हैं और अकॉउंट ऑफिस को भी भेजना होता है।
> बहुत बार तो बिजली/एलेक्ट्रिक की गड़बडी भी खुद ही ठीक करना होता हैं।
> रेलवे दुनिया की एक मात्र ऐसी नौकरी हैं जिसमे कई बार दूसरे की गलती की सजा आपको दी जाती है। और ऐसी सजा अक्सर SM को मिलती ही रहती है। अपनी गलती ना होने पर भी क्षमा याचना करनी पड़ती है।
> आम जिन्दगी में लोग लोग बहुत बार चाभी भूल जाते हैं, रुमाल भूल जाते हैं, कभी कलम तो कभी मोबाईल भूल जाते हैं। कुछ लोग चश्मा ढूँढते नज़र आते हैं।
बहुत बार SM अपने समय पे इंक्रिमेन्ट ना मिलने या कोई भत्ता ना मिलने के कारण ऑफिस जा जा कर अपनी चप्पलें घिसते हैं (वो भी नाइट ड्यूटी के बाद) और पता चलता है कि ये एक क्लर्क मिस्टेक है। जिसकी सजा क्लर्क को नहीं हमे मिलती है। अपने हक को पाने के लिये भी घूस देनी पड़ती है।
> लेकिन अधिक वर्क लोड के कारण, ऑफिस में लोगों की भीड़–भाड़ के कारण, कन्फयूजन के कारण या और भी किसी कारण से जीवन में केवल एक बार अगर कोई स्टेशन मास्टर कोई ग़लती कर जाये तो सज़ा मिलनी तय है। और अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो नौकरी से हाथ धोने के अलावा बांकी जिन्दगी जेल में बितानी पड़ सकती है। सीधा धारा -302 (जानबूझकर की गयी हत्या) का मामला दर्ज होता हैं।
> हमारे पास रेलवे के 16 विभाग से जुडे अधिकार नाम मात्र होते हैं और जिम्मेदारी (कर्तव्य) असिमित होती है। किसी विभाग की गलती का खामियाजा उसके साथ साथ ऑनड्यूटी SM को भी मिलता है। जैसे सब्जी कुछ भी पके, नमक तो बर्बाद होगा ही। इस लिये हर स्टेशन मास्टर को हरफनमौला बनना पड़ता है।
> छुट्टी तो भूल ही जाइए, रेस्ट कब मिलेगा यही निश्चित नहीं होता। स्टाफ के अभाव में ओवरटाइम ड्यूटी करना और बिना रेस्ट के कई हफ्तों ड्यूटी करना आम बात है।
  स्टेशन मास्टर की ड्यूटी बच्चों का खेल नही है। एक आग का दरिया है। जिसे तैर के पार करना है।

" वास्तव में स्टेशन मास्टर भारतीय रेलवे का वो सच्चा सिपाही हैं जो फ्रंट पे जाके लड़ता है। और हर वार को सीने पे झेलता है।
  अगर आप ट्रेन में आराम से सो रहें हैं, ताश खेल रहे हैं, लैपटाप पे फ़िल्म देख रहे हैं, नौकरी ज्वाईन करने जा रहे हैं , पर्व में परिवार से मिलने जा रहे हैं , तो हमेशा याद रखें की जाने कितने SM, गार्ड, लोको पायलट, गेटमैन इत्यादि कितनी तकलीफ़ और कठिनाई में ड्यूटी कर रहें हैं।

 
"भारतीय रेलवे न डीजल से चलती हैं, ना इलेक्ट्रिक से चलती हैं , ये तो ओपन लाइन स्टाफ के खून और पसीने से चलती है।"

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

प्वाइंटसमेन की ड्यूटी

 प्वाइंटसमेन की ड्यूटी लिस्ट (list of Pointsman Duty)

1. ऑन ड्यूटी स्टेशन मास्टर के अधीन सभी कार्य एंव बताये गये सभी निर्देशों का पालन करना।
2. सभी प्रकार के शंटिंग कार्य निस्पादित करना।
3. रोड साइड स्टेशनो पर ट्रेन के लोको पायलट एवं गार्ड के लाईन बाक्स को उतारना एवं चढाना।
4. आउट रिपोर्ट, कॉशन आर्डर एवं अन्य मेमो को देना।
5. स्टेशन के सभी रिकार्ड को सुरक्षित एवं सुसज्जित करना।
6. प्वाइन्ट मे बैलास्ट एवं गेट पर चक रेल को साफ करना।
7. संरक्षा उपकरण की साफ-सफाई एवं स्टेशन कार्यालय में स्टेशन मास्टर की सहायता करना।
8. ऑफ साइड से, आती हुई गाडी को ऑल राइट सिग्नल का आदान प्रदान करके एल वी / टेल बोर्ड को देखना।
9. असामान्य परिस्थितियो मे गेट क्रेंक हेन्डल, प्वाइन्ट क्रेंक हेन्डल एवं गाडियो को पायलट करना।
10. ट्रेन इनटेक्ट एवं शंटिंग आर्डर पर गार्ड से हस्ताक्षर कराना।
11. पैसेन्जर ट्रेन से कैश बैग एवं अन्य पार्सल / लैगेज, न्यूज पेपर आदि हेतु ब्रेक वान अटैन्ड करना।
12. बिना चार्ज दिये कार्य मुक्त नही होना, चार्ज पूर्णतः फिजीकली देना।
13. ट्रेक सर्किट, सिग्नल, ब्लाक उपकरण खराव होने पर विशेष डयूटी एवं लगातार सतत्‌ एवं सजग रहना।
14. ऑन ड्यूटि स्टेशन मास्टर द्वारा नामित डयूटी भी डयूटी लिस्ट में शामिल किये जायेंगे।
15. ब्लॉक के दौरान आइसोलेटर को खोलना एवं बंद करना।
16. घायल यात्रियो की सहायता हेतु विशेष डयूटी नामित
17. ड्यूटी के दौरान प्वाइन्ट फ्लैसिंग के मामले में तुरन्त प्वाइन्ट पर जाना।
18. ट्रेक ड्रॉप के मामले में रेल पथ का फिजिकली निरीक्षण करना की रेल फैक्चर तो नही है।
19. लोड स्टेवल के दौरान गुटके एवं जंजीर बांधना, ब्रेक कसने एवं खोलने मे गार्ड एवं लोको पायलट की सहायता करना।
20. टी. आई द्वारा काउन्सिलिंग में साइट पर जा कर क्रैंक हैन्डल, आइसोलेटर, गेट क्रैंक हैन्डल आदि का प्रशिक्षण लेना एवं स्वयं संचालित करके देखना।
21. प्वाइन्ट डिसकनेक्शन के दौरान प्वाइन्ट पर सजग रहना एवं आवश्यकता अनुसार प्वाइन्ट क्लेम्प करना एवं खोलना।

Source - G&SR of NCR 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोतम।


महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत।

।।१।।

अयि गिरि नन्दिनी नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।

गिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनी विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ-  हे हिमालायराज की कन्या, विश्व को आनंद देने वाली, नंदी गणों के द्वारा नमस्कृत, गिरिवर विन्ध्याचल के शिरो (शिखर) पर निवास करने वाली, भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाली, इन्द्रदेव के द्वारा नमस्कृत, भगवान् नीलकंठ की पत्नी, विश्व में विशाल कुटुंब वाली और विश्व को संपन्नता देने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली भगवती! अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


 ।।२।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।

त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवों को वरदान देने वाली, दुर्धर और दुर्मुख असुरों को मारने वाली और स्वयं में ही हर्षित (प्रसन्न) रहने वाली, तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को संतुष्ट करने वाली, पापों को हरने वाली और घोर गर्जना करने वाली, दानवों पर क्रोध करने वाली, अहंकारियों के घमंड को सुखा देने वाली, समुद्र की पुत्री हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।३।।

अयि जगदम्बमदम्बकदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते ।

शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते ।।

मधुमधुरे मधुकैटभगन्जिनि कैटभभंजिनि रासरते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- हे जगतमाता, मेरी माँ, प्रेम से कदम्ब के वन में वास करने वाली, हास्य भाव में रहने वाली, हिमालय के शिखर पर स्थित अपने भवन में विराजित, मधु (शहद) की तरह मधुर, मधु-कैटभ का मद नष्ट करने वाली, महिष को विदीर्ण करने वाली,सदा युद्ध में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।४।।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते ।

रिपु गजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।।

निजभुज दण्ड निपतित खण्ड विपातित मुंड भटाधिपते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शत्रुओं के हाथियों की सूंड काटने वाली और उनके सौ टुकड़े करने वाली, जिनका सिंह शत्रुओं के हाथियों के सर अलग अलग टुकड़े कर देता है, अपनी भुजाओं के अस्त्रों से चण्ड और मुंड के शीश काटने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।५।।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।

चतुरविचारधुरीणमहाशिव दूतकृत प्रथमाधिपते ।।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- रण में मदोंमत शत्रुओं का वध करने वाली, अजर अविनाशी शक्तियां धारण करने वाली, प्रमथनाथ (शिव) की चतुराई जानकार उन्हें अपना दूत बनाने वाली, दुर्मति और बुरे विचार वाले दानव के दूत के प्रस्ताव का अंत करने वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।६।।

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे ।

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे ।।

दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शरणागत शत्रुओं की पत्नियों के आग्रह पर उन्हें अभयदान देने वाली, तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों पर प्रहार करने योग्य त्रिशूल धारण करने वाली, देवताओं की दुन्दुभी से 'दुमि दुमि' की ध्वनि को सभी दिशाओं में व्याप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।७।।

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते।

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- मात्र अपनी हुंकार से धूम्रलोचन राक्षस को धूम्र (धुएं) के सामान भस्म करने वाली, युद्ध में कुपित रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न अन्य रक्तबीजों का रक्त पीने वाली, शुम्भ और निशुम्भ दैत्यों की बली से शिव और भूत-प्रेतों को तृप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।८।।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- युद्ध भूमि में जिनके हाथों के कंगन धनुष के साथ चमकते हैं, जिनके सोने के तीर शत्रुओं को विदीर्ण करके लाल हो जाते हैं और उनकी चीख निकालते हैं, चारों प्रकार की सेनाओं [हाथी, घोडा, पैदल, रथ] का संहार करने वाली अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाले बटुकों को उत्पन्न करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।९।।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते ।

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवांगनाओं के तत-था थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली, कु-कुथ अड्डी विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले ताल वाले स्वर्गीय गीतों को सुनने में लीन, मृदंग की धू-धुकुट, धिमि-धिमि आदि गंभीर ध्वनि सुनने में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१०।।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते ।

झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जय जयकार करने और स्तुति करने वाले समस्त विश्व के द्वारा नमस्कृत, अपने नूपुर के झण-झण और झिम्झिम शब्दों से भूतपति महादेव को मोहित करने वाली, नटी-नटों के नायक अर्धनारीश्वर के नृत्य से सुशोभित नाट्य में तल्लीन रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।११।।

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते ।

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- आकर्षक कान्ति के साथ अति सुन्दर मन से युक्त और रात्रि के आश्रय अर्थात चंद्र देव की आभा को अपने चेहरे की सुन्दरता से फीका करने वाली, काले भंवरों के सामान सुन्दर नेत्रों वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१२।।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते ।

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- महायोद्धाओं से युद्ध में चमेली के पुष्पों की भाँति कोमल स्त्रियों के साथ रहने वाली तथा चमेली की लताओं की भाँति कोमल भील स्त्रियों से जो झींगुरों के झुण्ड की भाँती घिरी हुई हैं, चेहरे पर उल्लास (ख़ुशी) से उत्पन्न, उषाकाल के सूर्य और खिले हए लाल फूल के समान मुस्कान वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१३।।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गजराजपते ।

त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिसके कानों से अविरल (लगातार) मद बहता रहता है उस हाथी के समान उत्तेजित हे गजेश्वरी, तीनों लोकों के आभूषण रूप-सौंदर्य, शक्ति और कलाओं से सुशोभित हे राजपुत्री, सुंदर मुस्कान वाली स्त्रियों को पाने के लिए मन में मोह उत्पन्न करने वाली मन्मथ (कामदेव) की पुत्री के समान, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१४।।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते ।

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।।

अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनका कमल दल (पंखुड़ी) के समान कोमल, स्वच्छ और कांति (चमक) से युक्त मस्तक है, हंसों के समान जिनकी चाल है, जिनसे सभी कलाओं का उद्भव हुआ है, जिनके बालों में भंवरों से घिरे कुमुदनी के फूल और बकुल पुष्प सुशोभित हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१५।।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते।

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।।

निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनके हाथों की मुरली से बहने वाली ध्वनि से कोयल की आवाज भी लज्जित हो जाती है, जो [खिले हुए फूलों से] रंगीन पर्वतों से विचरती हुयी, पुलिंद जनजाति की स्त्रियों के साथ मनोहर गीत जाती हैं, जो सद्गुणों से सम्पान शबरी जाति की स्त्रियों के साथ खेलती हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१६।।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे।

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनकी चमक से चन्द्रमा की रौशनी फीकी पड़ जाए ऐसे सुन्दर रेशम के वस्त्रों से जिनकी कमर सुशोभित है, देवताओं और असुरों के सर झुकने पर उनके मुकुट की मणियों से जिनके पैरों के नाखून चंद्रमा की भांति दमकते हैं और जैसे सोने के पर्वतों पर विजय पाकर कोई हाथी मदोन्मत होता है वैसे ही देवी के उरोज (वक्ष स्थल) कलश की भाँति प्रतीत होते हैं ऐसी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१७।।

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते।

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सहस्रों (हजारों) दैत्यों के सहस्रों हाथों से सहस्रों युद्ध जीतने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित, सुरतारक (देवताओं को बचाने वाला) उत्पन्न करने वाली, उसका तारकासुर के साथ युद्ध कराने वाली, राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की भक्ति से सामान रूप से संतुष्ट होने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१८।।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे।

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जो भी तुम्हारे दयामय पद कमलों की सेवा करता है, हे कमला! (लक्ष्मी) वह व्यक्ति कमलानिवास (धनी) कैसे न बने? हे शिवे! तुम्हारे पदकमल ही परमपद हैं उनका ध्यान करने पर भी परम पद कैसे नहीं पाऊंगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१९।।

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् ।

भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सोने के समान चमकते हुए नदी के जल से जो तुम्हे रंग भवन में छिड़काव करेगा वो शची (इंद्राणी) के वक्ष से आलिंगित होने वाले इंद्र के समान सुखानुभूति क्यों न पायेगा? हे वाणी! (महासरस्वती) तुममे मांगल्य का निवास है, मैं तुम्हारे चरण में शरण लेता हूँ, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२०।।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते।

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखीसु मुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

ममतु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- तुम्हारा निर्मल चन्द्र समान मुख चन्द्रमा का निवास है जो सभी अशुद्धियों को दूर कर देता है, नहीं तो क्यों मेरा मन इंद्रपूरी की सुन्दर स्त्रियों से विमुख हो गया है? मेरे मत के अनुसार तुम्हारी कृपा के बिना शिव नाम के धन की प्राप्ति कैसे संभव हो सकती है? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२१।।

अयि मयि दीन दयालु-तया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे।

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।।

यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।


अर्थ- हे दीनों पर दया करने वाली उमा! मुझ पर भी दया कर ही दो, हे जगत जननी! जैसे तुम दया की वर्ष करती हो वैसे ही तीरों की वर्ष भी करती हो, इसलिए इस समय जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो मेरे पाप और ताप दूर करो, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय  हो।

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

शिव तांडव स्तोत्रम् - मंत्र (Shiv Tandav Stotram)

 सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

Shiv Image

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं

चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।


जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी

विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है, जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है, जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं? जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है, और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।


धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर

स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे, अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं, जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं, जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।


जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा

कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है, ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।


सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर

प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।

भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक

श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, जिनका मुकुट चंद्रमा है, जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं, जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है, जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।


ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा

निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं

महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें, जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था, जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं, जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।


करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल

द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर, सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।


नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्

कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः

कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है, जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।


प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा

वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है, पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


अखर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी

रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण, जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस

द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है, जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण, गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।


दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्

गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?


कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए, अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

देवांगनाओं के सिर में गुथे पुष्पों की मालाओ के जड़ते हुए सुगंध में पराग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगो सुन्दरताई परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।


प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

प्रचन्ड वाडवानल की भाति पापो को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादि अष्ट महासिद्धिओ तथा चंचल नेत्रों वाली देव कन्याओ से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि, सब मंत्रो में परम श्रेष्ठ शिव मंत्र से मोहित सांसारिक दुखो को नष्ट करके विजय पाए।


इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है। इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।


पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं

यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

इति श्रीरावण कृतम्

शिव ताण्डव स्तोत्रम् सम्पूर्ण

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