रविवार, 18 जनवरी 2026

 कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक- घाघ के नीतिपरक दोहे

-----------------------------------------------

1- चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ में बेल।

सावन साग न भादों दही, क्वारें दूध न कातिक मही।

अगहन जीरा पूष धना, माघे मिश्री फागुन चना। 


घाघ! कहते हैं, चैत में गुड़, वैशाख में तेल, ज्येष्ठ में यात्रा, आषाढ़ में बेल, सावन में हरड़ साग, भादों में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में मट्ठा (लस्सी), मार्गशीर्ष (अगहन) में जीरा, पौष (पूष) में धनियां, माघ में मिश्री, फाल्गुन में चने खाना हानिप्रद होता है।


 2-जाको मारा चाहिए बिन मारे बिन घाव। 

वाको यही बताइये घुइया पूरी खाव।।


घाघ! कहते हैं, यदि किसी से शत्रुता हो तो उसे अरबी की सब्जी व पुड़ी खाने की सलाह दो। इसके लगातार सेवन से उसे कब्ज की बीमारी हो जायेगी और वह शीघ्र ही मरने योग्य हो जायेगा।


3- पहिले जागै पहिले सौवे, जो वह सोचे वही होवै।


घाघ! कहते हैं, रात्रि मे जल्दी सोने से और प्रातःकाल जल्दी उठने से बुध्दि तीव्र होती है। यानि विचार शक्ति बढ़ जाती है।


4- प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी। 

वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।। 


घाघ ! लिखते हैं, प्रातः काल उठते ही, जल पीकर शौच जाने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है, उसे डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 


5-सावन हर्रे भादों चीता, क्वार मास गुड़ खाहू मीता। 

कातिक मूली अगहन तेल, पूस में करे दूध सो मेल।

माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय। 

चैत मास में नीम सेवती, बैसाखहि में खाय बासमती। 

जैठ मास जो दिन में सोवे, ताको जुर अषाढ़ में रोवे।।


घाघ ! लिखते हैं, सावन में हरड़ का सेवन, भाद्रपद में चिरायता का सेवन, क्वार में गुड़, कार्तिक मास में मूली, अगहन में तेल, पूष में दूध, माघ में खिचड़ी, फाल्गुन में प्रातःकाल स्नान, चैत में नीम, वैशाख में चावल खाने और जेठ के महीने में दोपहर में सोने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, उसे ज्वर नहीं आता।


6- कांटा बुरा करील का, औ बदरी का घाम। 

सौत बुरी है चून को, और साझे का काम।। 


घाघ! कहते हैं, करील का कांटा, बदली (जब आकाश में बादल छाया हो एवं धूप भी निकला हो) की धूप, सौत ( सौतेला )चून की (अर्थात चूना से सौतेला व्यवहार नहीं करना चाहिए। भावार्थ यह है कि चूना का नित्य सेवन करना चाहिए) और साझे (सांझेदारी) का काम बुरा होता है। 


7-बिन बैलन खेती करै, बिन भैयन के रार। 

बिन महरारू घर करै, चैदह साख गवांर।। 


भड्डरी! लिखते हैं, जो मनुष्य बिना बैलों के खेती करता है, बिना भाइयों के झगड़ा या कोर्ट कचहरी करता है और बिना स्त्री के गृहस्थी का सुख पाना चाहता है, वह वज्र मूर्ख है। 


8-ताका भैंसा गादरबैल, नारि कुलच्छनि बालक छैल। 

इनसे बांचे चातुर लौग, राजहि त्याग करत हं जौग।। 


घाघ! लिखते हैं, तिरछी दृष्टि से देखने वाला भैंसा, बैठने वाला बैल, कुलक्षणी स्त्री और विलासी पुत्र दुखदाई हैं। चतुर मनुष्य राज्य त्याग कर सन्यास लेना पसन्द करते हैं, परन्तु इनके साथ रहना पसन्द नहीं करते। 


9-जाकी छाती न एकौ बार, उनसे सब रहियौ हुशियार।


घाघ! कहते हैं, जिस मनुष्य की छाती पर एक भी बाल नहीं हो, उससे सावधान रहना चाहिए। क्योंकि वह कठोर हृदय, क्रोधी व कपटी हो सकता है। 


10- खेती पाती बीनती, और घोड़े की तंग। 

अपने हाथ संभारिये, लाख लोग हो संग।।


घाघ! कहते हैं, खेती, प्रार्थना पत्र, तथा घोड़े के तंग को अपने हाथ से ठीक करना चाहिए किसी दूसरे पर विश्वास नहीं करना चाहिए। 


11- जबहि तबहि डंडै करै,

ताल नहाय, ओस में परै।

दैव न मारै आपै मरैं। 


भड्डरी! लिखते हैं, जो पुरूष कभी-कभी व्यायाम करता हैं, ताल में स्नान करता हैं और ओस में सोता है, उसे भगवान नहीं मारता, वह तो स्वयं मरने की तैयारी कर रहा है।


12- विप्र टहलुआ अजा धन और कन्या की बाढि। 

इतने से न धन घटे तो करैं बड़ेन सों रारि।।


घाघ! कहते हैं, ब्राह्मण को सेवक रखना, बकरियों का धन, अधिक कन्यायें उत्पन्न होने पर भी, यदि धन न घट सकें तो बड़े लोगों से झगड़ा मोल ले, धन अवश्य घट जायेगा।


13- औझा कमिया, वैद किसान। 

आडू बैल और खेत मसान। 


भड्डरी! लिखते हैं, नौकरी करने वाला औझा, खेती का काम करने वाला वैद्य, बिना बधिया किया हुआ बैल और मरघट के पास का खेत हानिकारक है।।"

 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

क्षणभंगुर - जीवन की कलिका

क्षणभंगुर - जीवन की कलिका

लेखकः श्री नाथूराम शास्त्री 'नम्र'. बरेली.

श्री नाथूराम शास्त्री की यह रचना सन १९६० के आसपास की है। उन्होने एक खंडकाव्य लिखा था। यह कविता उसी का एक भाग थी। पूरी कविता इस प्रकार है-


क्षणभंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली।।

मलयाचल की शुचि शीतल मन्द सुगन्ध समीर मिली न मिली।।

कलि काल कुठार लिए फिरता, तन नम्र से चोट झिली न झिली।

रटले हरिनाम अरी रसना, फिर अन्त समय में हिली न हिली।।


मुख सूख गया रोते रोते, फिर अमृत ही बरसाया तो क्या।

जब भव सागर में डूब चुके, तब फिर नाविक को लाया तो क्या।।

युगलोचन बन्द हमारे हुए, तब निष्ठुर तू मुस्काया तो क्या।

जब जीवन ही न रहा जग मे, तब आकर दरश दिखाया तो क्या।।


बळी जाऊँ सदा इन नैनन की, बलिहारी छटा पे में होता रहूँ।

 मुझे भूले न नाम तुम्हारा प्रभु, चाहे जागृत या स्वप्न में सोता रहूँ।।

हरे कृष्ण ही कृष्ण पुकारूँ सदा, मुख आँसुओ से नित धोता रहूँ।।

बृजराज तुम्हारे बियोग में मैं, बस यूँ ही निरन्तर रोता रहूँ।।


वह पायेगा क्या रस का चस्का, नहीं कृष्ण से प्रीत लगायेगा जो।

हरे कृष्ण उसे समझेगा वही, रसिकों के समाज में जायेगा जो।।

ब्रज धूरी लपेट कलेवर में, गुण नित्य किशोर के गायेगा जो।

हँसता हुआ श्याम मिलेगा उसे, निज प्राणों की बाजी लगायेगा जो।।


मन में बसी बस चाह यही, प्रिय नाम तुम्हारा उचाना करूँ।

बिठला के तुम्हें मन मन्दिर में, मनमोहिनी रूप निहारा करूँ।।

भर के दृग पात्र में प्रेम का जल, पद पंकज नाथ पखारा करूँ।

बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभो, नित आरती भव्य उतारा करूँ।।


जिनके मन में नन्दलाल बसे, तिन और नाम लियो न लियो।

जिसने बृंदावन धाम कियो, तिन औनहु धाम कियो न कियो।।


शाम भयी पर श्याम न आये, श्याम बिना क्यों शाम सुहाये।

 व्याकुल मन हर शाम से पूछे, शाम बता क्यों श्याम न आये।।


शाम ने श्याम का राज बताया, शाम ने क्योंकर श्याम को पाया।

 शाम ने श्याम के रंग में रंग कर, अपने आप को श्याम बनाया।।

मंगलवार, 26 मार्च 2024

राम नाम के साबुन से जो मन का मैल छुड़ाएगा।

 राम नाम के साबुन से, जो मन का मेल छुड़ाएगा | निर्मल मन के दर्पण में, वह राम का दर्शन पाएगा || (२)

नर शरीर अनमोल रे प्राणी, प्रभु कृपा से पाया है। झूठे जग प्रपंच में पड़कर क्यों प्रभु को विसराया है || (२)

समय हाथ से निकल गया तो...... (२) सिर धुन धुन पछताएगा |

निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा |

राम नाम के साबुन से जो मन का मेल छुड़ाएगा | निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा ||

झूठ कपट निंदा को त्यागो, हर प्राणी से प्यार करो । घर पर आए अतिथि कोई तो यथा शक्ति सत्कार करो || (२)

क्यों ?

पता नहीं किस रूप में आकर ....... (२) नारायण मिल जाएगा |

निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा |

राम नाम के साबुन से जो मन का मेल छुड़ाएगा | निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा ||

साधन तेरा कच्चा है, जब तक प्रभु पर विश्वास नहीं। मंजिल कर पाना है, क्या जब दीपक में परकाश नहीं || (२)

निश्चय है तो भवसागर से....... (२) बेडा पार हो जाएगा |

निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा |

राम नाम के साबुन से जो मन का मेल छुड़ाएगा | निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा ||

दौलत का अभिमान है झूठा, यह तो आनी जानी है। राजा रंक अनेकों हुए, कितनों की सुनी कहानी है || (२)

राम नाम प्रिय महा मन्त्र ही....... (२) साथ तुम्हारे जाएगा |

निर्मल मन के दर्पण में वह, राम का दर्शन पाएगा |

राम नाम के साबुन से जो......(२) मन का मेल छुड़ाएगा ।

निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा |

राम नाम के साबुन से जो मन का मेल छुड़ाएगा | निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा ||

शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

सोशल मीडिया और फेक जिन्दगी।

 सोशल मीडिया और फेक जिन्दगी

कल त्यौहार के अगले दिन मेरी अर्धांगिनी जी मुझसे कहने लगी कि आज मेरा पूरा दिन दिमाग खराब रहा है और सिर दर्द होने लगा। मैने कारण जानने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। लेकिन मैं सोचता रहा कि आज ऐसी क्या बात हो गई। 

मैं अंतर्यामी तो हूं नहीं, लेकिन मैं कारण जान गया। बात ये थी कि उन्होंने सोशल मीडिया पर बहुत सारे रील और स्टेटस देख लिए जिनमें लोग अपने बेडरूम के अंदर तक की प्रदर्शनी लगाए हुए थे।

जब सोशल मीडिया पर लोग दूसरों के स्टेटस रील आदि देखते हैं तो अपने आप को भूल कर उसमें खो जाते हैं, उस रील और स्टेटस में अपनी जिंदगी ढूंढने लग जाते हैं। उनसे अपनी तुलना शुरू करना शुरू कर देते हैं। फिर शुरू होती है दिमाग के अंदर जद्दोजहद। मैं उस इंसान जैसा क्यों नहीं हूं, मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरी पत्नी, मेरा बेडरूम, मेरी नौकरी, मेरा परिवार, मेरे रिश्तेदार, मेरे आभूषण, ये सब उस आदमी जैसे क्यों नहीं हैं, हाय मेरी जिन्दगी उस महिला जैसी क्यों नहीं है, और न जाने क्या–क्या। भगवान तूने मुझे वो सब क्यों नहीं दिया। वो भूल जाता है कि उस दूसरे आदमी के जीवन में जो परेशानियां हैं वो उन्हें अपने स्टेटस पर नहीं डाल रहा है, और जो वो दिखा रहा है उसमे भी वास्तविकता कम और दिखावा ज्यादा है।

आज से बीस तीस साल पहले तक ये सब नहीं होता था क्योंकि सोशल मीडिया नहीं थी। आधुनिक समय में मोबाइल फोन ने लोगों का सोचने का नजरिया पूरी तरह से बदल दिया है। इंसान अपने सुख से खुश नहीं अपितु दूसरों के सुख से दुःखी रहने लगा है। पहले सब अपने आप में खुश रहते थे। लोग आधी रोटी खा कर और फटे हुए कपड़े पहन कर भी आनंद में रहते थे। लेकिन जीवन का वह स्वाद अब नहीं रहा। इसीलिए तो आज सारी सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी लोग दुःखी होकर जीने के लिए आमादा हैं। मैं तो बस यही कहूंगा कि दूसरे से अपनी तुलना कभी न करें। हर इंसान के पास खुश रहने के हजार कारण होते हैं, और दुःखी रहने के भी हजार कारण हो सकते हैं, परंतु तय आपको करना है कि आप कौन सी जिंदगी चुन रहे हो। 

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

समय की उपयोगिता।

 समय का सदुपयोग ही

                        जीवन का सार है।

यूनान के प्रबुद्ध विचारक अरस्तू ने कहा है – “दुनिया से हर चीज वापस आ सकती है। यहाँ तक कि रूठे भगवान को भी मनाया जा सकता है. किन्तु समय एक ऐसा तत्व है, जो निर्वाध गति से चलता रहता है और एक बार गया समय दोबारा बापस नहीं आता. ऐसा मंत्र या ऐसा कोई सूत्र नहीं बना, जो गए समय को वापस ला सके.” अरस्तू के विचार में गहरी सत्यता थी. समय को समझने का सूत्र स्वयं निर्मित करना होता है. उसकी गति को स्वयं ही पहचानने की छमता विकसित करनी होती है. समय की उपयोगिता को स्वयं ही समझना होता है. समय इतनी तेज गति से चलता है कि यदि दक्ष भाव के साथ समय को पकड़ा न जाए और उसकी उपयोगिता का वरण न किया जाए तो जीवन गहन अन्धकार में डूबता चला जाएगा. जीवन इतना व्यर्थ हो जाएगा जिसकी कल्पना भी असंभव-सी है. समय पूजनीय है, विचारणीय तथा इश्वर की भांति प्रातः स्मरणीय है. किसी भी क्षण का शतांश भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना वह क्षण स्वयं.

 समय को इधर-उधर के कामों में नष्ट करने वालों तथा हर काम को टालते रहने वालों के विरुद्ध सन् १९४९ में उदासीन सम्प्रदाय के जीनो के शिष्य सेनेका (Seneca) ने एक घोषणा-पत्र प्रकाशित किया था. वह घोषणा-पत्र आज भी इतना ही नवीन एवं प्रासंगिक है जितना आज से दो हजार वर्ष पूर्व था. हमें आज भी प्रत्येक काम को यह कह कर टालते हुए देखे जा सकते हैं की – कर लेंगे क्या जल्दी है, इसे कभी भी किया जा सकता है. इनको यह नहीं मालूम है की जिस कम को कभी भी किया जा सकता है, उसको कभी नहीं किया जा सकता है.

 सेनेका ने उस शिकायत की और इंगित किया था जो उन दिनों प्रायः सुनने को मिलती रहती थीं. समय का अभाव हमारे जीवन का बहुत बड़ा अभिशाप है. हमारा जीवनकाल बहुत ही स्वल्प है. जब तक हम किसी काम को करने के लिए पूरी तरह तैयार होते हैं, तब तक हमारे जीवनकाल के अंत का समय आ जाता है आदि. हमें स्मरण रखना चाहिए की काम के लिए तैयारी की जरूरत नहीं होती है – उसे तो किया जाता है – अभी और यहीं. स्रष्टि के आरम्भ में मनुष्य की आयु ४० वर्ष थी. तब इसी प्रकार समयाभाव की शिकायत करके उसने भगवान से अपनी आयु की सीमा १०० वर्ष करा ली, परन्तु फिर भी समयाभाव द्वारा वह ग्रसित बना रहता है, क्योंकि यह समय को व्यतीत करना चाहती है, उसका उपयोग नहीं करना चाहता है.

 क्या आप और हम कभी इस बात पर विचार करते हैं की कितने महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्होंने अल्पावस्था में ही अपने कार्यों द्वारा विश्वा को चम्त्क्रत कर दिया था? सेनेका ने लिखा है की जिन सम्पन्न व्यक्तियों के पास खाली समय में मौज करने की सुविधा है, वे भी समयाभाव की शिकायत करते हैं. इस संदर्भ में ला बुयर नामक विचारक ने लिखा है की जो समय का सर्वार्धिक दुरुपयोग करते हैं वे समयाभाव की सर्वार्धिक शिकायत करते हैं, क्योंकि उन्हें समय के दुरुपयोग से फुरसत नहीं मिलती है और उसके सदुपयोग के लिए उन्हें समय नहीं मिलता है. एक अत्यंत विरोधाभासपूर्ण तथ्य है की जो सर्वार्धिक व्यस्त है, उसके लिए उपयोगी कार्य के लिए सर्वार्धिक समय रहता है – एक व्यस्त व्यक्ति के पास हर कार्य के लिए समय रहता है.

 सेनेका लिखता है कि समस्या समयाभाव की नहीं है. समस्या यह है की हम लोग जीवनकाल का एक बहुत बड़ा भाग व्यर्थ की बातों या व्यर्थ के कामों में नष्ट करते रहते हैं. जीवनावधि पर्याप्त दीर्घ रहती है और श्रेष्ठतम उपलब्धियों के लिए हमें पर्याप्त लम्बा जीवन मिलता है. बात केवल हमारी द्रष्टि और समझदारी की है. समझदार और समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति यह जानते हैं की जिस प्रकार स्वर्ण का प्रत्येक रेशा मूल्यवान होता है, उसी प्रकार समय का प्यात्येक क्षण मूल्यवान होता है. जो ऐसा नहीं समझते हैं, वे समय को व्यतीत होने देते हैं और वे आने वाले कल की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जबकि उनका कल कभी नहीं आता है. समय व्यतीत होता है या नहीं, यह विवाद का विषय है, परन्तु यह निर्विवाद है की हम प्रति क्षण नष्ट होते रहते हैं. समय का दुरूपयोग करने वाले केवल पश्चाताप करते रहते हैं – सांप निकल जाता है लकीरें रह जाती हैं. समय की यह बहुत बड़ी विशेषता है की जैसे-जैसे उसका सदुपयोग किया जाता है, वैसे-वैसे व्यक्ति में समय का लाभ उठाने की अधिकाधिक शक्ति आती रहती है. कहा भी गया है की एक व्यस्त आदमी के पास हर काम के लिए समय होता है. तुम यदि किसी काम कराना ही चाहते हो तो उसे किसी व्यस्त आदमी को सौंप दो।

शनिवार, 25 मार्च 2023

नाजुक रिश्ता और ज़िम्मेदारी

नाजुक रिश्ता और ज़िम्मेदारी

दुनिया में जो कुछ पाने लायक है उस पर वर्क करना पड़ता है। चाहे अच्छा करियर हो या अच्छे रिश्ते। कई बार लगता है बात नहीं बन पाएगी। और नहीं हो पाएगा। इसे छोड़ना पड़ेगा। मगर हम रिश्ते को ज़रूरी समझते हैं तो उसे बार-बार संवारते हैं। तब भी सामने वाले को मनाते हैं जब जानते थे कि हमारी गलती नहीं थी। तब भी हम सामने वाले को शर्मिंदा नहीं करते जब हम जानते थे कि उसी की गलती थी।

रिश्तों में कितनी ही बार ऐसा होता है जब आपको लगता है कि मैं इस आदमी के साथ नहीं रह सकती या मैं इस औरत के साथ नहीं रह सकता। मगर जैसे-तैसे खुद को संभाल के, अपने गुस्से को जज़्ब करके आप खुद को उस नाज़ुक पल से निकाल ले जाते हैं। फिर चीज़ें नॉर्मल हो जाती हैं और बाद में आपको इस बात का गर्व भी होता है कि कैसे उस नाजुक मौके पर मैं खुद पर काबू रख पाया।

कोई भी रिश्ता उन नाजुक मौकों पर खुद पर काबू रखने की एक लंबी श्रृंखला होता है। जिस रिश्ते पर 10-15 साल बाद आप गर्व करते हैं उसे आप न जाने कितने ही कमज़ोर क्षणों से बचाकर लाए होते हैं।

मगर Instant gratification (फौरी खुशी) के दौर पर में आज किसी में भी रिश्तों को वक्त देने का पेशंस नहीं। हर पहले झगड़े पर लगता है बहुत हो गया या ये इंसान मेरे लिए ठीक नहीं और आप Perfect इंसान की तलाश में Move on कर जाते हैं। वो Perfect इंसान जिसकी तलाश इंडियाना जोन्स के किसी खजाने से भी ज़्यादा मुश्किल है। जिसे ढूंढने के लिए आपके पास कोई नक्शा भी नहीं है। आप सिर्फ इस झूठे भरोसे से नए आदमी की तलाश में निकल पड़ते हैं ताकि उस रिश्ते से निकाल जाने के लिए खुद के सामने कोई रिवॉर्ड रख सकें।

इस सोच की वजह से आज रिश्ते आज रेडलाइट पर मिलने वाले किसी चाइनीज़ चार्जर से भी कम चलते हैं। मगर ऑनलाइन खाना और सामना ऑर्डर करने और रिश्तों में यही फर्क है। रिश्तों में कुछ भी Instant नहीं होता। यहां कुछ भी Tailor Made नहीं है। पसंद का सूट बनवाया जा सकता है मगर रिश्तों में समझ बनानी पड़ती है। यहां कोई आपका नाप नहीं लेगा बल्कि खुद आपको सामने वाले के दिल और समझ की गहराई नापनी होती है। उस रिश्ते की ज़िम्मेदारी लेनी होती है।

मगर ज़िम्मेदारी ऐसी चीज़ है कि न समझो तो इंसान अपने मां-बाप की भी नहीं समझता। समझो, तो सर्दी में नाइट ड्यूटी कर रहे गार्ड की भी फिक्र होती है। करियर में पीछे रह गए दोस्तों की भी चिंता होती है और अपने छोटे बच्चों को अकेला छोड़कर आने वाली कामवाली के लिए भी बुरा लगता है। आसपास मौजूद इतने सारे दुखों के बीच आप खुद को बेहद छोटा और असहाय पाते हैं। कामयाबी शायद कुछ और नहीं, बस अपने दायरे में आने वाले लोगों के दुखों की ज़िम्मेदारी उठा पाना है, न कि अपनी खुशियों में मगरूर रहकर हर किसी के प्रति आंख मूंद लेना, एक ज़रा सी बात पर उससे पिंड छुड़ा लेना। चले जाने का विकल्प हमेशा खुला होता है। साथ रहने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है। बशर्ते आप मानते हों कि साथ रहना ज़रूरी है। 
क्रेडिट–Neeraj Badhwar(लेखक–बातें कम scam ज्यादा)

मंगलवार, 21 मार्च 2023

राजनीति और चुनाव चिन्ह

 

राजनीति और चुनाव चिन्ह

थका-हारा मजदूर अभी-अभी सोया था, नींद की पहली ही पारी में खोया था।

तभी उसके गाल पर जोरदार तमाचा पड़ा, हड़बड़ा कर मजदूर हो गया खड़ा।

मजदूर बोला- अरे चोरों मेरा सब कुछ ले जाओ, मगर कमबख्तों, अँधेरे में यूँ हाथ-पैर तो न चलाओ।

आदमी बोले- हम चोर नहीं हम तो कांग्रेसी हैं।

अगर अँधेरे में यूँ हाथ-पैर न चलायेंगे, तो तुझे अपना चुनाव चिन्ह कैसे बतायेंगे।

मजदूर बोला- अगर सभी दल यूँ प्रैक्टिस में अपना चुनाव चिन्ह बतलायेंगे,

तो हम कहाँ जायेंगे, हाथी-हथौड़े बाले आ गए तो हम मारे जायेंगे।

कांग्रेसी बोले- अब मजदूर तुझे हमें जिताना है,

और जितनी जोर से तेरे गाल पर तमाचा पड़ा है, उतनी जोर से हाथ के पंजे वाला बटन दबाना है।

तभी मजदूर ने देखा, दरवाजे पर त्रिशूल लिए एक महात्मा खड़ा था।

मजदूर बोला- बाबा आप भी उम्मीदवार हैं,

महात्मा बोला- हाँ बच्चा हम तेरे वोट के तलबगार हैं।

मजदूर बोला- पर क्या आपका चुनाव चिन्ह ये त्रिशूल है।

महात्मा बोला- नहीं बच्चा हमारा चुनाव चिन्ह तो कमल का फूल है, अगर वोट न दिया तो फिर यह त्रिशूल है।

अगर वोट न दिया तो तेरी अंतड़ियों में उतार देंगे, और सीधा स्वर्ग सिधार देंगे,

कमल के फूल वाला ही बटन दबाना।

मजदूर के आँखों की गुल हो गयी बत्ती, धक्-धक् करने लगी छाती क्योंकि दरवाजे पर खड़ा था हाथी।

हाथी बोला – क्यों बे मजदूर तुझे कभी हमारा भी ख्याल आया है।

मजदूर बोला- माई-बाप आज कल तो आप और आपकी ही ‘माया’ है।

हम आपको भूल जाएँ हमारी क्या है औकात, हम जानते हैं आपके पंजे की त्रिज्या और अपने पेट का व्यास।

तभी कुछ देर बाद गले में बैलगाड़ी का पहिया डाले जनता दल वाले आये।

जनता दल वाले बोले- क्यों बे मजदूर आज तेरे दिल की सारी हसरतें निकाल दें,

और अपने गले का भार तेरे गले में डाल देंं,

मजदूर बोला-नहीं माई-बाप उसे तो आप ही डाले रहिये, मुझे क्या करना है कहिये।

जनता दल वाले बोले- अगर खुद को पहिये के भार से चाहता है बचाना,

तो वैलगाड़ी के पहिये वाला ही बटन दबाना।

मजदूर था हैरान, कैसे-कैसे प्रत्याशी, कैसे-कैसे निशान, लेकिन देखा विधि का विधान।

मजदूर वेचारा डर गया, और चुनाव वाले दिन बिना वोट दिए ही मर गया.


  कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक- घाघ के नीतिपरक दोहे ----------------------------------------------- 1- चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ मे...