समय का सदुपयोग ही
जीवन का सार है।
यूनान के प्रबुद्ध विचारक अरस्तू ने कहा है – “दुनिया से हर चीज वापस आ सकती है। यहाँ तक कि रूठे भगवान को भी मनाया जा सकता है. किन्तु समय एक ऐसा तत्व है, जो निर्वाध गति से चलता रहता है और एक बार गया समय दोबारा बापस नहीं आता. ऐसा मंत्र या ऐसा कोई सूत्र नहीं बना, जो गए समय को वापस ला सके.” अरस्तू के विचार में गहरी सत्यता थी. समय को समझने का सूत्र स्वयं निर्मित करना होता है. उसकी गति को स्वयं ही पहचानने की छमता विकसित करनी होती है. समय की उपयोगिता को स्वयं ही समझना होता है. समय इतनी तेज गति से चलता है कि यदि दक्ष भाव के साथ समय को पकड़ा न जाए और उसकी उपयोगिता का वरण न किया जाए तो जीवन गहन अन्धकार में डूबता चला जाएगा. जीवन इतना व्यर्थ हो जाएगा जिसकी कल्पना भी असंभव-सी है. समय पूजनीय है, विचारणीय तथा इश्वर की भांति प्रातः स्मरणीय है. किसी भी क्षण का शतांश भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना वह क्षण स्वयं.
समय को इधर-उधर के कामों में नष्ट करने वालों तथा हर काम को टालते रहने वालों के विरुद्ध सन् १९४९ में उदासीन सम्प्रदाय के जीनो के शिष्य सेनेका (Seneca) ने एक घोषणा-पत्र प्रकाशित किया था. वह घोषणा-पत्र आज भी इतना ही नवीन एवं प्रासंगिक है जितना आज से दो हजार वर्ष पूर्व था. हमें आज भी प्रत्येक काम को यह कह कर टालते हुए देखे जा सकते हैं की – कर लेंगे क्या जल्दी है, इसे कभी भी किया जा सकता है. इनको यह नहीं मालूम है की जिस कम को कभी भी किया जा सकता है, उसको कभी नहीं किया जा सकता है.
सेनेका ने उस शिकायत की और इंगित किया था जो उन दिनों प्रायः सुनने को मिलती रहती थीं. समय का अभाव हमारे जीवन का बहुत बड़ा अभिशाप है. हमारा जीवनकाल बहुत ही स्वल्प है. जब तक हम किसी काम को करने के लिए पूरी तरह तैयार होते हैं, तब तक हमारे जीवनकाल के अंत का समय आ जाता है आदि. हमें स्मरण रखना चाहिए की काम के लिए तैयारी की जरूरत नहीं होती है – उसे तो किया जाता है – अभी और यहीं. स्रष्टि के आरम्भ में मनुष्य की आयु ४० वर्ष थी. तब इसी प्रकार समयाभाव की शिकायत करके उसने भगवान से अपनी आयु की सीमा १०० वर्ष करा ली, परन्तु फिर भी समयाभाव द्वारा वह ग्रसित बना रहता है, क्योंकि यह समय को व्यतीत करना चाहती है, उसका उपयोग नहीं करना चाहता है.
क्या आप और हम कभी इस बात पर विचार करते हैं की कितने महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्होंने अल्पावस्था में ही अपने कार्यों द्वारा विश्वा को चम्त्क्रत कर दिया था? सेनेका ने लिखा है की जिन सम्पन्न व्यक्तियों के पास खाली समय में मौज करने की सुविधा है, वे भी समयाभाव की शिकायत करते हैं. इस संदर्भ में ला बुयर नामक विचारक ने लिखा है की जो समय का सर्वार्धिक दुरुपयोग करते हैं वे समयाभाव की सर्वार्धिक शिकायत करते हैं, क्योंकि उन्हें समय के दुरुपयोग से फुरसत नहीं मिलती है और उसके सदुपयोग के लिए उन्हें समय नहीं मिलता है. एक अत्यंत विरोधाभासपूर्ण तथ्य है की जो सर्वार्धिक व्यस्त है, उसके लिए उपयोगी कार्य के लिए सर्वार्धिक समय रहता है – एक व्यस्त व्यक्ति के पास हर कार्य के लिए समय रहता है.
सेनेका लिखता है कि समस्या समयाभाव की नहीं है. समस्या यह है की हम लोग जीवनकाल का एक बहुत बड़ा भाग व्यर्थ की बातों या व्यर्थ के कामों में नष्ट करते रहते हैं. जीवनावधि पर्याप्त दीर्घ रहती है और श्रेष्ठतम उपलब्धियों के लिए हमें पर्याप्त लम्बा जीवन मिलता है. बात केवल हमारी द्रष्टि और समझदारी की है. समझदार और समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति यह जानते हैं की जिस प्रकार स्वर्ण का प्रत्येक रेशा मूल्यवान होता है, उसी प्रकार समय का प्यात्येक क्षण मूल्यवान होता है. जो ऐसा नहीं समझते हैं, वे समय को व्यतीत होने देते हैं और वे आने वाले कल की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जबकि उनका कल कभी नहीं आता है. समय व्यतीत होता है या नहीं, यह विवाद का विषय है, परन्तु यह निर्विवाद है की हम प्रति क्षण नष्ट होते रहते हैं. समय का दुरूपयोग करने वाले केवल पश्चाताप करते रहते हैं – सांप निकल जाता है लकीरें रह जाती हैं. समय की यह बहुत बड़ी विशेषता है की जैसे-जैसे उसका सदुपयोग किया जाता है, वैसे-वैसे व्यक्ति में समय का लाभ उठाने की अधिकाधिक शक्ति आती रहती है. कहा भी गया है की एक व्यस्त आदमी के पास हर काम के लिए समय होता है. तुम यदि किसी काम कराना ही चाहते हो तो उसे किसी व्यस्त आदमी को सौंप दो।

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