कल त्यौहार के अगले दिन मेरी अर्धांगिनी जी मुझसे कहने लगी कि आज मेरा पूरा दिन दिमाग खराब रहा है और सिर दर्द होने लगा। मैने कारण जानने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। लेकिन मैं सोचता रहा कि आज ऐसी क्या बात हो गई।
मैं अंतर्यामी तो हूं नहीं, लेकिन मैं कारण जान गया। बात ये थी कि उन्होंने सोशल मीडिया पर बहुत सारे रील और स्टेटस देख लिए जिनमें लोग अपने बेडरूम के अंदर तक की प्रदर्शनी लगाए हुए थे।
जब सोशल मीडिया पर लोग दूसरों के स्टेटस रील आदि देखते हैं तो अपने आप को भूल कर उसमें खो जाते हैं, उस रील और स्टेटस में अपनी जिंदगी ढूंढने लग जाते हैं। उनसे अपनी तुलना शुरू करना शुरू कर देते हैं। फिर शुरू होती है दिमाग के अंदर जद्दोजहद। मैं उस इंसान जैसा क्यों नहीं हूं, मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरी पत्नी, मेरा बेडरूम, मेरी नौकरी, मेरा परिवार, मेरे रिश्तेदार, मेरे आभूषण, ये सब उस आदमी जैसे क्यों नहीं हैं, हाय मेरी जिन्दगी उस महिला जैसी क्यों नहीं है, और न जाने क्या–क्या। भगवान तूने मुझे वो सब क्यों नहीं दिया। वो भूल जाता है कि उस दूसरे आदमी के जीवन में जो परेशानियां हैं वो उन्हें अपने स्टेटस पर नहीं डाल रहा है, और जो वो दिखा रहा है उसमे भी वास्तविकता कम और दिखावा ज्यादा है।
आज से बीस तीस साल पहले तक ये सब नहीं होता था क्योंकि सोशल मीडिया नहीं थी। आधुनिक समय में मोबाइल फोन ने लोगों का सोचने का नजरिया पूरी तरह से बदल दिया है। इंसान अपने सुख से खुश नहीं अपितु दूसरों के सुख से दुःखी रहने लगा है। पहले सब अपने आप में खुश रहते थे। लोग आधी रोटी खा कर और फटे हुए कपड़े पहन कर भी आनंद में रहते थे। लेकिन जीवन का वह स्वाद अब नहीं रहा। इसीलिए तो आज सारी सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी लोग दुःखी होकर जीने के लिए आमादा हैं। मैं तो बस यही कहूंगा कि दूसरे से अपनी तुलना कभी न करें। हर इंसान के पास खुश रहने के हजार कारण होते हैं, और दुःखी रहने के भी हजार कारण हो सकते हैं, परंतु तय आपको करना है कि आप कौन सी जिंदगी चुन रहे हो।
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