रविवार, 23 अक्टूबर 2022

बचपन की यादें, मैंने साईकिल चलाना कैसे सीखा?

बचपन की यादें...

मैंने साइकिल चलाना कैसे सीखा?
उस समय साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पिताजी या चाचा चलाया करते थे तब साइकिल की ऊंचाई 40 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना संभव नहीं होता था...
"हमने कैंची चलाना सीखा"
"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे। आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से मरहूम है उन्हे नहीं पता की आठ दस साल की उमर में 40 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था। हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तोड़वाए हैं और गज़ब की बात ये है कि तब दर्द भी नहीं होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपने हाफ कच्छे को पोंछते हुए।
अब तकनीकी ने बहुत विकास कर लिया है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो–दो फिट की साइकिल आ गयी है, और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में....
मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! "जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं।
इधर से चक्की तक साइकिल लुढकाते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए! इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी। और ये भी सच है की हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी, हम लोग इस दुनिया की वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
पहला चरण कैंची
दूसरा चरण डंडा
तीसरा चरण गद्दी
(फिर बादशाहों वाली फीलिंग्स)
हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी, पहला चरण कैंची और दूसरा चरण डंडा तीसरा चरण गद्दी.....

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोतम।


महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत।

।।१।।

अयि गिरि नन्दिनी नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।

गिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनी विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ-  हे हिमालायराज की कन्या, विश्व को आनंद देने वाली, नंदी गणों के द्वारा नमस्कृत, गिरिवर विन्ध्याचल के शिरो (शिखर) पर निवास करने वाली, भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाली, इन्द्रदेव के द्वारा नमस्कृत, भगवान् नीलकंठ की पत्नी, विश्व में विशाल कुटुंब वाली और विश्व को संपन्नता देने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली भगवती! अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


 ।।२।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।

त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवों को वरदान देने वाली, दुर्धर और दुर्मुख असुरों को मारने वाली और स्वयं में ही हर्षित (प्रसन्न) रहने वाली, तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को संतुष्ट करने वाली, पापों को हरने वाली और घोर गर्जना करने वाली, दानवों पर क्रोध करने वाली, अहंकारियों के घमंड को सुखा देने वाली, समुद्र की पुत्री हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।३।।

अयि जगदम्बमदम्बकदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते ।

शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते ।।

मधुमधुरे मधुकैटभगन्जिनि कैटभभंजिनि रासरते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- हे जगतमाता, मेरी माँ, प्रेम से कदम्ब के वन में वास करने वाली, हास्य भाव में रहने वाली, हिमालय के शिखर पर स्थित अपने भवन में विराजित, मधु (शहद) की तरह मधुर, मधु-कैटभ का मद नष्ट करने वाली, महिष को विदीर्ण करने वाली,सदा युद्ध में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।४।।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते ।

रिपु गजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।।

निजभुज दण्ड निपतित खण्ड विपातित मुंड भटाधिपते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शत्रुओं के हाथियों की सूंड काटने वाली और उनके सौ टुकड़े करने वाली, जिनका सिंह शत्रुओं के हाथियों के सर अलग अलग टुकड़े कर देता है, अपनी भुजाओं के अस्त्रों से चण्ड और मुंड के शीश काटने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।५।।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।

चतुरविचारधुरीणमहाशिव दूतकृत प्रथमाधिपते ।।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।

 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- रण में मदोंमत शत्रुओं का वध करने वाली, अजर अविनाशी शक्तियां धारण करने वाली, प्रमथनाथ (शिव) की चतुराई जानकार उन्हें अपना दूत बनाने वाली, दुर्मति और बुरे विचार वाले दानव के दूत के प्रस्ताव का अंत करने वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।६।।

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे ।

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे ।।

दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- शरणागत शत्रुओं की पत्नियों के आग्रह पर उन्हें अभयदान देने वाली, तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों पर प्रहार करने योग्य त्रिशूल धारण करने वाली, देवताओं की दुन्दुभी से 'दुमि दुमि' की ध्वनि को सभी दिशाओं में व्याप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।७।।

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते।

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- मात्र अपनी हुंकार से धूम्रलोचन राक्षस को धूम्र (धुएं) के सामान भस्म करने वाली, युद्ध में कुपित रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न अन्य रक्तबीजों का रक्त पीने वाली, शुम्भ और निशुम्भ दैत्यों की बली से शिव और भूत-प्रेतों को तृप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।८।।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- युद्ध भूमि में जिनके हाथों के कंगन धनुष के साथ चमकते हैं, जिनके सोने के तीर शत्रुओं को विदीर्ण करके लाल हो जाते हैं और उनकी चीख निकालते हैं, चारों प्रकार की सेनाओं [हाथी, घोडा, पैदल, रथ] का संहार करने वाली अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाले बटुकों को उत्पन्न करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।९।।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते ।

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- देवांगनाओं के तत-था थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली, कु-कुथ अड्डी विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले ताल वाले स्वर्गीय गीतों को सुनने में लीन, मृदंग की धू-धुकुट, धिमि-धिमि आदि गंभीर ध्वनि सुनने में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१०।।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते ।

झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जय जयकार करने और स्तुति करने वाले समस्त विश्व के द्वारा नमस्कृत, अपने नूपुर के झण-झण और झिम्झिम शब्दों से भूतपति महादेव को मोहित करने वाली, नटी-नटों के नायक अर्धनारीश्वर के नृत्य से सुशोभित नाट्य में तल्लीन रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।११।।

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते ।

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- आकर्षक कान्ति के साथ अति सुन्दर मन से युक्त और रात्रि के आश्रय अर्थात चंद्र देव की आभा को अपने चेहरे की सुन्दरता से फीका करने वाली, काले भंवरों के सामान सुन्दर नेत्रों वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१२।।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते ।

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- महायोद्धाओं से युद्ध में चमेली के पुष्पों की भाँति कोमल स्त्रियों के साथ रहने वाली तथा चमेली की लताओं की भाँति कोमल भील स्त्रियों से जो झींगुरों के झुण्ड की भाँती घिरी हुई हैं, चेहरे पर उल्लास (ख़ुशी) से उत्पन्न, उषाकाल के सूर्य और खिले हए लाल फूल के समान मुस्कान वाली, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१३।।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गजराजपते ।

त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिसके कानों से अविरल (लगातार) मद बहता रहता है उस हाथी के समान उत्तेजित हे गजेश्वरी, तीनों लोकों के आभूषण रूप-सौंदर्य, शक्ति और कलाओं से सुशोभित हे राजपुत्री, सुंदर मुस्कान वाली स्त्रियों को पाने के लिए मन में मोह उत्पन्न करने वाली मन्मथ (कामदेव) की पुत्री के समान, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१४।।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते ।

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।।

अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनका कमल दल (पंखुड़ी) के समान कोमल, स्वच्छ और कांति (चमक) से युक्त मस्तक है, हंसों के समान जिनकी चाल है, जिनसे सभी कलाओं का उद्भव हुआ है, जिनके बालों में भंवरों से घिरे कुमुदनी के फूल और बकुल पुष्प सुशोभित हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१५।।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते।

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।।

निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनके हाथों की मुरली से बहने वाली ध्वनि से कोयल की आवाज भी लज्जित हो जाती है, जो [खिले हुए फूलों से] रंगीन पर्वतों से विचरती हुयी, पुलिंद जनजाति की स्त्रियों के साथ मनोहर गीत जाती हैं, जो सद्गुणों से सम्पान शबरी जाति की स्त्रियों के साथ खेलती हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।


।।१६।।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे।

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जिनकी चमक से चन्द्रमा की रौशनी फीकी पड़ जाए ऐसे सुन्दर रेशम के वस्त्रों से जिनकी कमर सुशोभित है, देवताओं और असुरों के सर झुकने पर उनके मुकुट की मणियों से जिनके पैरों के नाखून चंद्रमा की भांति दमकते हैं और जैसे सोने के पर्वतों पर विजय पाकर कोई हाथी मदोन्मत होता है वैसे ही देवी के उरोज (वक्ष स्थल) कलश की भाँति प्रतीत होते हैं ऐसी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१७।।

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते।

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सहस्रों (हजारों) दैत्यों के सहस्रों हाथों से सहस्रों युद्ध जीतने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित, सुरतारक (देवताओं को बचाने वाला) उत्पन्न करने वाली, उसका तारकासुर के साथ युद्ध कराने वाली, राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की भक्ति से सामान रूप से संतुष्ट होने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१८।।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे।

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- जो भी तुम्हारे दयामय पद कमलों की सेवा करता है, हे कमला! (लक्ष्मी) वह व्यक्ति कमलानिवास (धनी) कैसे न बने? हे शिवे! तुम्हारे पदकमल ही परमपद हैं उनका ध्यान करने पर भी परम पद कैसे नहीं पाऊंगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।१९।।

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् ।

भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- सोने के समान चमकते हुए नदी के जल से जो तुम्हे रंग भवन में छिड़काव करेगा वो शची (इंद्राणी) के वक्ष से आलिंगित होने वाले इंद्र के समान सुखानुभूति क्यों न पायेगा? हे वाणी! (महासरस्वती) तुममे मांगल्य का निवास है, मैं तुम्हारे चरण में शरण लेता हूँ, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२०।।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते।

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखीसु मुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

ममतु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।


अर्थ- तुम्हारा निर्मल चन्द्र समान मुख चन्द्रमा का निवास है जो सभी अशुद्धियों को दूर कर देता है, नहीं तो क्यों मेरा मन इंद्रपूरी की सुन्दर स्त्रियों से विमुख हो गया है? मेरे मत के अनुसार तुम्हारी कृपा के बिना शिव नाम के धन की प्राप्ति कैसे संभव हो सकती है? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।


।।२१।।

अयि मयि दीन दयालु-तया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे।

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।।

यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।


अर्थ- हे दीनों पर दया करने वाली उमा! मुझ पर भी दया कर ही दो, हे जगत जननी! जैसे तुम दया की वर्ष करती हो वैसे ही तीरों की वर्ष भी करती हो, इसलिए इस समय जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो मेरे पाप और ताप दूर करो, हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो, जय हो, जय  हो।

कोहरे के मौसम में लोको पायलट द्वारा रेल गाड़ियों का संचालन।

कोहरे के मौसम के दौरान लोको पायलट द्वारा ट्रेन संचालन
एनसीआर के जी एंड एसआर में संशोधन पर्ची संख्या 55 दिनांक 04.12.2018

 मौजूदा SR3.61/2(a)().().()&(iv) को हटा दिया जाता है और निम्नानुसार प्रतिस्थापित किया जाता है (संदर्भ-ईडी/सुरक्षा-II/रेलवे बोर्ड, पत्र संख्या 98/सुरक्षा (ए एंड आर)/ 19/16, दिनांक-23.10.2018)

 एसआर 3.61/2(ए) लोको पायलट द्वारा सावधानियां: - लोको पायलट कोहरे के दौरान ट्रेन की गति के संबंध में निम्नानुसार कार्रवाई करेगा

 (i) फॉग के दौरान जब लोको पायलट अपने फैसले में महसूस करता है कि कोहरे के कारण दृश्यता सीमित है, तो वह ऐसी गति से दौड़ें जिससे वह ट्रेन को नियंत्रित कर सके ताकि किसी भी बाधा से पहले गाड़ी को रोकने के लिए तैयार रहे। यह गति किसी भी स्थिति में 75 किमी प्रति घंटे से अधिक नहीं होगी। 

 (ii) गेटमैन (जहां उपलब्ध हो) और सड़क उपयोगकर्ताओं को समपारों पर आने वाली ट्रेन के बारे में चेतावनी देने के लिए लोको पायलट को बार-बार सीटी बजानी चाहिए।

 (iii) एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम में गति 75 किमी प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए जैसा कि ऊपर मद (i) में बताया गया है।

 (iv) स्वचालित ब्लॉक टेरिटरी में गति लोको पायलट के निर्णय के अधीन होगी जैसा कि ऊपर मद (i) में उल्लिखित है और निम्न से अधिक नहीं होगी:

 (ए) 'ग्रीन' पर स्वचालित स्टॉप सिग्नल पास करने के बाद गति 75 किमी प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए।

 (बी) 'डबल येलो' पर एक स्वचालित स्टॉप सिग्नल पास करने के बाद गति 30 किमी प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए।

 (सी) पीले पर एक स्वचालित स्टॉप सिग्नल पास करने के बाद लोको पायलट को और प्रतिबंधित गति से चलाने के लिए ताकि अगले स्टॉप सिग्नल पर रुकने के लिए तैयार किया जा सके।

 नोट (i) - फॉग सेफ डिवाइस का प्रावधान: - कोहरे के दौरान कोहरे प्रभावित क्षेत्रों में चलने वाले सभी लोकोमोटिव में विश्वसनीय फॉग सेफ डिवाइस, यदि उपलब्ध हो, लोको पायलटों को प्रदान किए जा सकते हैं। एसआर 3.61/1(बी)(ii) में निर्धारित शर्तों के तहत डेटोनेटरों की नियुक्ति को हटा दिया जाएगा, जहां विश्वसनीय फॉग सेफ डिवाइस उपलब्ध है और कार्य में है। 

 नोट (ii) - यदि लोकोमोटिव में फॉग सेफ डिवाइस उपलब्ध नहीं है या डिवाइस अधिकतम मार्ग में विफल रहता है तो ऊपर बताए अनुसार 75 किमी प्रति घंटे की गति को 60 किमी प्रति घंटे या उससे कम के निर्णय के अधीन घटाया जाएगा।

 नोट (iii) - जैसा कि जीआर 4.16 (1) (बी) के तहत प्रदान किया गया है, कोहरे के मौसम में अंतिम वाहन जांच उपकरण को इंगित करने के लिए दिन या रात के दौरान एक चमकती लाल बत्ती प्रदर्शित करने वाले अनुमोदित डिजाइन का एक लाल टेल लैंप प्रदान किया जाना चाहिए और उस पर जलाया जाना चाहिए अंतिम वाहन।

 नोट (iv) - प्रत्येक स्टेशन का फर्स्ट स्टॉप सिग्नल लोकेशन किलोमीटर चार्ट प्रत्येक लोको पायलट को या तो ले जाने में आसान कार्ड के रूप में या वर्किंग टाइम टेबल में प्रदान किया जाना चाहिए।

 नोट (v) - "साइन ऑन" के दौरान लॉबी में मौजूद कोहरे की स्थिति के बारे में कर्मीदल और गार्ड को सूचित किया जाना चाहिए।

TRAIN OPERATION DURING FOGGY WEATHER
Amendment Slip No. 55 dated 04.12.2018 to the G&SR of NCR

Existing SR3.61/2(a)().().()&(iv) is deleted and substituted as under (Ref.-E.D/Safety-II/Railway Board, letter no.98/Safety(A&R)/19/16, dated-23.10.2018)

SR 3.61/2(a) Precautions by Loco Pilot:- The Loco Pilot shall take action in regard to speed of the train during fog as under

(i) During fog when the Loco Pilot in his judgement feels that visibility is restricted due to fog, he shall
run at a speed at which he can control the train so as to be prepared to stop short of any
obstruction; this speed shall in any case not be more than 75 kmph. 
(ii) Loco Pilot to whistle frequenctly to warn the gateman (where provided) and road users of an approaching train at level crossings.
(iii) In Absolute Block System the speed should not exceed 75 kmph as detailed at item (i) above.
(iv) in Auwmatic Block Territory the speed will be subject to the judgement of the Loco Pilot as mentioned in item (i) above and shall not exceed as under:
(a) After passing Automatic stop signal at 'Green' the speed not to exceed 75 kmph.
(b) After passing an Automatic stop signal at 'Double Yellow' the speed not to exceed 30 kmph.
(c) After passing an Automatic stop signal at Yellow the Loco Pilot to run at a further restricted speed so as to be prepared to stop at the next stop signal.

Note(i)-Provision of Fog Safe Device:-Reliable Fog Safe Devices, if available, may be provided to the Loco Pilots in all Locomotives running in fog affected areas during fog. Placement of detonators under conditions as prescribed in SR 3.61/1(b)(ii) shall be dispensed with, where reliable Fog Safe
Device is available and is in working order.

Note(ii) - In case fog safe device is not available in locomotives or the device fails enroute the maximum
speed of 75 kmph as indicated above shall be reduced to 60 kmph or less subject to judgement of
Loco Pilot.

Note (iii)-As provided under GR 4.16 (1) (b) a red tail lamp of approved design displaying a flashing red light, during day or night, to indicate last vehicle check device in foggy weather should be provided and lit on the last vehicle.

Note(iv) - First Stop Signal location kilometre chart of every station be provided to each Loco Pilot either as an easy to carry Card or in the Working Time Table.

Note(v) - Prevailing Fog situation should be advised to Crew and Guard in lobby during "Sign On".

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

वो भी क्या जमाना था।

हमारी पढ़ाई वाला जमाना सन् 2000 और उसके आसपास

एक जमाना था...

जब खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत ही नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे, उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था।

पास/फेल यही हमको मालूम था... परसेंटेज नंबरों(%) से हमारा कोई लेना देना नहीं था।

ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था।

किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थीं।

कपड़े की थैली में... बस्तों में.. और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी।

हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था।

साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी, क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम।

हमारे माताजी पिताजी को हमारी पढ़ाई बोझ है ऐसा कभी लगा ही नहीं।

किसी एक दोस्त को साइकिल के अगले डंडे पर और दूसरे दोस्त को पीछे कैरियर पर बिठाकर गली-गली में घूमना हमारी दिनचर्या थी, इस तरह हम ना जाने कितना घूमे होंगे।

स्कूल में मास्टर जी के हाथ से मार खाना, पैर के अंगूठे पकड़ कर खड़े रहना, और कान लाल होने तक मरोड़े जाते वक्त हमारा ईगो कभी आड़े नहीं आता था, सही बोलें तो ईगो क्या होता है यह हमें मालूम ही नहीं था।

घर और स्कूल में मार खाना भी हमारे दैनंदिन जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी। मारने वाला और मार खाने वाला दोनों ही खुश रहते थे। मार खाने वाला इसलिए क्योंकि कल से आज कम पिटे हैं, और मारने वाला इसलिए कि आज फिर हाथ धो लिए।

बिना चप्पल जूते के और किसी भी गेंद के साथ लकड़ी के पटियों से कहीं पर भी नंगे पैर क्रिकेट खेलने में क्या सुख था वह हमको ही पता है।

हमने पॉकेट मनी कभी भी मांगी ही नहीं और पिताजी ने कभी दी भी नहीं इसलिए हमारी आवश्यकता भी छोटी–छोटी सी ही थीं। साल में कभी-कभार दो चार बार सेव मिक्सचर का भेल, चूरन, गोली, टॉफी खा लिया तो बहुत होता था।


रविवार, 16 अक्टूबर 2022

शिव तांडव स्तोत्रम् - मंत्र (Shiv Tandav Stotram)

 सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

Shiv Image

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं

चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।


जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी

विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है, जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है, जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं? जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है, और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।


धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर

स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे, अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं, जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं, जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।


जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा

कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है, ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।


सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर

प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।

भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक

श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, जिनका मुकुट चंद्रमा है, जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं, जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है, जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।


ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा

निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं

महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें, जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था, जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं, जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।


करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल

द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर, सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।


नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्

कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः

कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है, जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।


प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा

वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है, पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


अखर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी

रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण, जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस

द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है, जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण, गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।


दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्

गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?


कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए, अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

देवांगनाओं के सिर में गुथे पुष्पों की मालाओ के जड़ते हुए सुगंध में पराग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगो सुन्दरताई परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।


प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

प्रचन्ड वाडवानल की भाति पापो को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादि अष्ट महासिद्धिओ तथा चंचल नेत्रों वाली देव कन्याओ से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि, सब मंत्रो में परम श्रेष्ठ शिव मंत्र से मोहित सांसारिक दुखो को नष्ट करके विजय पाए।


इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है। इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।


पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं

यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

इति श्रीरावण कृतम्

शिव ताण्डव स्तोत्रम् सम्पूर्ण

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

संशोधन पर्ची संख्या 73, साधारण एवं सहायक नियमावली उत्तर मध्य रेलवे

उ.म.रे. के साधारण एवं सहायक नियम की संशोधन पर्ची सं.- 73 दिनांक 24.08.2022

01. वर्तमान सा. नि. 1.01(1) को हटाया जाता है और उसके स्थान पर निम्नलिखित को प्रतिस्थापित किया जाता है।

सा.नि. 1.01 (1): इन नियमों को भारतीय रेल (चालित लाइनें) साधारण (दूसरा संशोधन) नियम, 2022 कहा जाएगा।

02. वर्तमान सा. नि. 4.08( 1 (क) को हटाया जाता है और उसके स्थान पर निम्नलिखित को प्रतिस्थापित किया जाता है–

सा.नि. 4.08 (1) (क) रेलवे के प्रत्येक सेक्शन में प्रत्येक रेलगाड़ी को उस गति सीमा के भीतर ही चलाया जाएगा, जो विशेष अनुदेशों द्वारा उस सेक्शन के लिए मंजूर की गई है। 

03. नया स.नि. 4.08/3 निम्नानुसार जोड़ा जाता है–

स.नि. 4.08/3 रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा पहले से खोले गए खंड के लिए सेक्शन की गति को 110 किमी प्रति घंटा तक बढ़ाते समय निम्नलिखित निर्देशों का पालन किया जाएगा–

(i) क्षेत्रीय रेलवे के प्रमुख मुख्य अभियंता को रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा पहले से खोले गए सेक्शन की गति को 110 किमी प्रति घंटा तक बढ़ाने की मंजूरी देने का अधिकार है।

(ii) इसके अलावा, क्षेत्रीय रेलवे द्वारा सेक्शन की गति को 110 किमी प्रति घंटा से अधिक बढ़ाने के लिए रेल संरक्षा आयुक्त की मंजूरी ली जाएगी।

04. वर्तमान स.नि. 3.78/5 को हटाया जाता है और उसके स्थान पर निम्नलिखित को प्रतिस्थापित किया जाता है–

स.नि. 3.78/5- यदि लोको पायलट ने किसी सेक्शन में काफी समय से कार्य नहीं किया है, तब वह निम्नानुसार रोड लर्निंग प्राप्त कर मार्ग की पुनः जानकारी प्राप्त करेगा–



संशोधन पर्ची संख्या 74, साधारण एवं सहायक नियमावली उत्तर मध्य रेलवे

Amendment Slip No.-74, dated- 03.10.2022 to the G&SR of NCR


01 Existing SR 4.10/2 is deleted and substituted as under- (A/Slip No.-74)

SR 4.10/2 Following precautionary conditions must be followed during NI work at 30 Kmph

(i) Speed can be raised up to 30 kmph with clamping and padlocking of points by using suitable clamps.

(ii)No separate temporary panel is needed and only free home signal shall be given.

(iii) Integrity of point shall be checked by Operating Staff as per extant practice adopted during NI.

(iv) Physical verification of track shall be done by Station Master physically.

(v) Necessary safety directions should be incorporated in temporary working instructions for non-interlocking at maximum speed 30 Kmph with suitable infrastructural support as deemed necessary.

02. Existing note under SR 4.11/1(a)(i) is deleted. (A/Slip No.-74)


एनसीआर के जीएंडएसआर में संशोधन पर्ची सं.-74, दिनांक- 03.10.2022

01 मौजूदा एसआर 4.10/2 हटा दिया जाता है और इसे निम्नानुसार प्रतिस्थापित किया जाता है।

SR 4.10/2 30 Kmph . पर NI कार्य के दौरान निम्नलिखित एहतियाती शर्तों का पालन किया जाना चाहिए।

 (i) उपयुक्त क्लैंप का उपयोग करके पॉइंट्स की क्लैम्पिंग और पैडलॉकिंग के साथ गति को 30 किमी प्रति घंटे तक बढ़ाया जा सकता है।

 (ii) अलग से अस्थायी पैनल की जरूरत नहीं है और केवल होम सिग्नल दिया जाएगा।

 (iii) NI के दौरान अपनाई गई मौजूदा प्रथा के अनुसार ऑपरेटिंग स्टाफ द्वारा प्वाइंट की सत्यता की जांच की जाएगी।

 (iv) ट्रैक का भौतिक सत्यापन स्टेशन मास्टर द्वारा भौतिक रूप से किया जाएगा।

 (v) 30 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति से नॉन-इंटरलॉकिंग के लिए अस्थायी कार्य निर्देशों में आवश्यक सुरक्षा निर्देशों को शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि आवश्यक समझा जाए।

02. एसआर 4.11/1(a)(i) के तहत मौजूदा नोट को हटा दिया जाता है।

  कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक- घाघ के नीतिपरक दोहे ----------------------------------------------- 1- चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ मे...