मंगलवार, 27 सितंबर 2022

देश, समाज और हम

          चंद लाइनें 


सदियों से हमको अपनी भूलों ने मार डाला।
कांटों से बच गए पर फूलों ने डाला।

 

पर्दा पड़ा है जिहालत का आंखों पे‌ 
हटाते हटाते बहुत दिन चले गए 
जाने क्या पीकर के सोए हैं ऐसे
जगाते जगाते बहुत दिन चले गए।

 

ऐ वतनों के नौजवां, जा रहा तू कहां।
याद कर वो दास्तां जिसको गाता है जहां।

 

आज सब अरमान धूमिल हो गये।
समझा था हम भी काबिल हो गये।
गैरों से शिकवे गिले क्या करें।
अपनों ही अपनों के कातिल‌ हो गये।


 

मनुष्य हर काम में तर्क और बुद्धि का प्रयोग करते हैं शिवाय धर्म और ईश्वर के क्षेत्र में। जबकि सबसे अधिक बुद्धि का बिषय यही है।

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